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मजेदार बाल कविता : मक्खी का आटा

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव

Makkhi n mosquito
 
हाथ बढ़ाकर मक्खी दीदी,
पीस रही थी चक्की।
तभी कहीं से आया मच्छर,
जो था पूरा झक्की।
 
भन-भन करते बड़ी जोर से,
मक्खी जी को काटा।
जान छोड़कर भागी मक्खी,
धरा रह गया आटा।
 
 
(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है...)

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