Hanuman Chalisa

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

महावीर जयंती पर जानिए अनेकांतवाद का अर्थ, क्यों आज भी प्रासंगिक है यह सिद्धांत

Advertiesment
Mahavir swami
Mahavir Swami: अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने तीर्थंकरों के धर्म और परंपरा को सुव्यवस्थित रूप दिया। कैवल्य का राजपथ निर्मित किया। संघ-व्यवस्था का निर्माण किया:- मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका। यही उनका चतुर्विघ संघ कहलाया। इसके लिए उन्होंने धर्म का मूल आधार अहिंसा को बनाया और उसी के विस्तार रूप पंच महाव्रतों- अहिंसा, अमृषा, अचौर्य, अमैथुन और अपरिग्रह व यमों का पालन करने के लिए मुनियों को उपदेश किया। यदि हम दर्शन की बात करें तो अनेकांतवाद और स्यादवाद उनके दर्शन के प्रमुख सिद्धांत हैं।
 

अनेकांतवाद और स्यादवाद:

अनेकांतवाद वस्तु और स्यादवाद ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है। इसे समझना कठिन है। यहां इतना ही जानना उचित है कि यह पदार्थ और ज्ञान (आत्मा) संबंधी जैन अवधारणा का सिद्धांत है। सत्ता की दृष्टि से इसे अनेकांतवाद और ज्ञान की दृष्टि से इसे स्यादवाद कहा जाता है।
 
अर्थ: 'स्यात्' का अर्थ 'शायद' (अनिश्चितता) नहीं है, बल्कि यह वस्तु के एक विशिष्ट पहलू की सुनिश्चितता को दर्शाता है।
अवधारणा: यह संकेत देता है कि सत्य बहुआयामी है। एक समय में हम वस्तु के एक ही सत्य को देख और कह पाते हैं, लेकिन अन्य सापेक्षताओं (Contexts) में उसके अन्य सत्य भी समान रूप से अस्तित्व में होते हैं।
मूल आधार: महावीर दर्शन के अनुसार, अनेकांत (विचार) ही वाणी में स्याद्वाद, आचरण में अहिंसा और व्यवस्था में अपरिग्रह बनकर प्रकट होता है।
उद्देश्य: इसका लक्ष्य समाज में समानता, शांति और निष्कपट जीवन की स्थापना करना है। महावीर ने इसके माध्यम से सभी जीवों और पदार्थों को समान रूप से स्वतंत्र और विराट घोषित किया।
मुख्य बिंदु: स्याद्वाद संशय नहीं, बल्कि सत्य को उसके संपूर्ण और विविध रूपों में स्वीकार करने की वैज्ञानिक दृष्टि है।
 

अनेकांतवाद क्या है?

इस जगत में अनेक वस्तुएं हैं और उनके अनेक धर्म (गुण-तत्व) हैं। जैन दर्शन मानता है कि मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों, पेड़ और पौधों में ही चेतना या जीव नहीं होते बल्कि धातुओं और पत्थरों जैसे जड़ पदार्थ में भी जीव रहते हैं। पुदगलाणु भी अनेक और अनंत हैं जिनके संघात बनते-बिगड़ते रहते हैं।
 
अनेकांतवाद कहता है कि वस्तु के अनेक गुण-धर्म होते हैं। वस्तु के अनेक धर्म आगंतुक अर्थात आते-जाते रहते हैं। इसका मतलब कि पदार्थ उत्पन्न और विनष्ट होता रहता है, परिवर्तनशील, आकस्मिक और अनित्य है। अत: पदार्थ या द्रव्य का लक्षण है बनना, बिगड़ना और फिर बन जाना। यही अनेकांतवाद का सार है।
 
इसे इस तरह में समझें कि हर वस्तु को मुख्य और गौण, दो भागों में बाँटें तो एक दृष्टि से एक चीज सत्‌ मानी जा सकती है, दूसरी दृष्टि से असत्‌। अनेकांत में समस्त विरोधों का समन्वय हो जाता है। अत: सत्य को अनेक दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।
 

स्यादवाद क्या है?

'सापेक्षता', अर्थात 'किसी अपेक्षा से'। अपेक्षा के विचारों से कोई भी चीज सत्‌ भी हो सकती है, असत्‌ भी। इसी को 'सत्तभंगी नय' से समझाया जाता है। इसी का नाम 'स्यादवाद' है। स्यादवाद का अर्थ सापेक्षतावाद होता है। सापेक्ष सत्य। हम किसी भी पदार्थ या ब्रह्मांड का ज्ञान दार्शनिक बुद्धि की कोटियों से प्राप्त नहीं कर सकते। इससे सिर्फ आंशिक सत्य ही हाथ लगता है। इसके लिए जैन एक उदाहरण देते हैं:-
 
एक अंधे ने हाथी के पैर छूकर कहा कि हाथी खम्भे के समान है। दूसरे ने कान छूकर कहा कि हाथी सूपड़े के समान है। तीसरे ने सूँड छूकर कहा कि हाथी एक विशाल अजगर के समान है। चौथे ने पूँछ छूकर कहा कि हाथी रस्सी के समान है। दार्शनिक या तार्किक विवाद भी इसी तरह चलते रहते हैं, किंतु सभी आँख वाले जानते हैं कि समग्र हाथी इनमें से किसी के भी समान नहीं है।
 
महावीर स्वामी ने स्वयं भगवतीयसूत्र में आत्मा की सत्ता के विषय में स्याद अस्ति, स्याद नास्ति और स्याद अवक्तव्यम इन तीन भंगों का उल्लेख किया है।
 
आत्मा और ब्रह्मांड संबंधी जैन धारणा: ईश्वरवादी धर्म मानते हैं कि जीव और जगत को ईश्वर ने बनाया है। इसका मतलब तीन का अस्तित्व हुआ। पहला ईश्वर, दूसरा जीव और तीसरा जगत। लेकिन जैन दर्शन का मानना है कि दो का ही अस्तित्व है पहला जीव और दूसरा जगत। जीव अनेक हैं उसी तरह जिस तरह की जगत के तत्व अनेक हैं।
 
दो का ही अस्तित्व है- जीव और जगत। दोनों एक-दूसरे से बद्ध हैं। बद्ध अर्थात बंधन में होना। शरीर और आत्मा। आत्मा के बगैर शरीर निश्चेत है और शरीर के बगैर आत्मा की उपस्थिति का अर्थ नहीं। लेकिन जो मुक्त आत्मा है उन्हें ही आत्मा होने का आभास है।
 
पूरयंति गलंति च अर्थात जो पूर्ण होते रहें और गलते रहें, जो बनते-बिगड़ते रहें उस सूक्ष्मातिसूक्ष्म अणु को पुदगल कहा जाता है। दूसरे धर्म दर्शन इसे माया, प्रकृति या परमाणु कहते हैं। भौतिक जड़ द्रव्य के लिए जैन 'पुदगल' शब्द का प्रयोग करते हैं।
 
जैन दर्शन अनुसार चेतन जीव और अचेतन पुदगल दोनों ही परस्पर भिन्न, स्वतंत्र और नित्य तत्व हैं। अर्थात ब्रह्मांड में केवल जीव और अजीव दो ही तत्व हैं। जीव का अजीव से पृथक हो जाना ही कैवल्य है।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

Mahavir Jayanti 2026 date: अहिंसा, सत्य और शांति का पावन पर्व महावीर जयंती, जानें इतिहास, महत्व और परंपराएं