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चुनाव और लोकतंत्र की शामत

गिरीश पांडेय
Elections and democracy: हर चुनाव लोकतंत्र की शामत लेकर आता है। जिस देश में पूरे साल किसी न किसी हिस्से में चुनाव चल रहा हो, वहां के लोकतंत्र की हालत का अंदाजा आप लगा सकते हैं।
 
बचाने वालों की संख्या देख घबरा जाता है लोकतंत्र। यह तो आम चुनाव है। हर आम चुनाव में लोकतंत्र बुरी तरह घबरा जाता है। दरअसल चुनाव में उसे एक साथ इतने लोग बचाने आ जाते हैं कि वह घबरा जाता है। इस घबराहट की वजह से उसके अपने होने या न होने को लेकर भी शक होने लगता है। 
 
संवैधानिक संस्थाओं को भी होती है बेचैनी : कमोबेश ऐसी ही बेचैनी संविधान, न्यायपालिका और अन्य ऐसी संस्थाओं को भी होने लगती। मंच से इनकी भी आजादी खतरे में है जैसी बातें दुहराई जाती हैं।  
 
जनता पर नहीं होता कोई खास असर : जनता तो निर्विकार होती है। हालांकि चुनावों के केंद्र में वही होती। चुनावों कुछ पहले से वह जनार्दन हो जाती है। पर बाद में कभी हुई नहीं। अपनी इस हकीकत से भली भांति वाकिफ जनता अमूमन चुनावों में भी निर्विकार रहती है। उसे मंथरा के जरिए तुलसीदास बहुत पहले सीख दे गए कि इसी मनोदशा के नाते करीब आधे लोग तो वोट ही देने नहीं जाते।
 
अलबत्ता इनमें से अधिकांश को वोट देने और दिलाने के लिए दारू, मुर्गा, साड़ी, पायल और नकदी के रूप में जो बख्शीश मिलती है उससे कोई परहेज नहीं। क्योंकि उनको पता है कि जीतने वाले के हिस्से में मलाई आएगी। निकटम प्रतिद्वंदी को भी शांत रहने के लिए उसका कुछ न कुछ हिस्सा आ ही जाएगा। उसके हिस्से में हरदम की तरह बाबाजी का ठुल्लू ही आएगा।
 
झूठ की तो चांदी रहती है : ऐसा नहीं है कि चुनाव में हर कोई घबराया रहता है। कुछ लोगों की चांदी भी रहती है। इसमें सबसे प्रमुख है झूठ। और उसके बाद नौकरशाह चुनाव में अगर झूठ जम जाए तो यह सच से अधिक असरदार और व्यापक होता है। अमूमन यह जम भी जाता है। गरीबी हटाओ, एक शेरनी सौ लंगूर चिकमंगलूर चिकमंगलूर,  राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है, ठाकुर बुद्धि अहीर का बल झंडू हो गया जनता दल जैसे तमाम नारे इसके सबूत भी है।
 
फिलहाल लोकसभा चुनाव में कमोबेश सभी दल झूठ के इसी जमे जमाए नुस्खे को आजमा रहे हैं। अपने यहां झूठ की खेती, इसकी ही खाद पानी और वोट के रूप में इसकी बंपर फसल काटने की समृद्ध परंपरा रही है। आजादी के बाद से अब तक के चुनावी नारों, वायदों और उनकी जमीनी हकीकत इसका प्रमाण है।
 
सच तो यह है कि आजादी के बाद माननीयों और राजनीतिक दलों की ओर दिए गए नारे जनता की उम्मीदों के अधूरे दस्तावेज हैं। अगर ये पूरे हो गए होते तो देश कहां से कहां पहुंच गया होता। लगभग एक साथ आजाद हुए जापान हमारे सामने सबसे बड़ी मिसाल है।
 
नौकरशाही भी आम तौर पर खुश रहती है। क्योंकि उसके लिए कोई जीते कोई हारे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। बहुत पड़ा तो उन्नीस और बीस का। वह 13 खाने की रिंच होती है। लिहाजा सरकार किसी की बने वह अपना उचित समायोजन खोज ही लेती है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala

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