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सैयद हैदर रज़ा को अपनी भटकन में मि‍ला होगा कला का ‘वि‍चि‍त्र उन्‍माद’

Webdunia
रविवार, 26 जुलाई 2020 (13:50 IST)
अखिलेश

सैयद हैदर रज़ा को भारतीय चित्रकला संसार में अनेक कारणों से जाना जाता है- उनकी सादगी, उनकी शाईस्तगी, उनका उदारमन, यात्रा, विश्राम, अनुभव, लगाम आदि, आदि।

किन्तु जिस ख़ास बात के लिए उनकी जगह विश्व कला पटल पर हमेशा जीवित और प्रेरणास्पद रहेगी वह रंग हैं। एक चित्रकार के लिए रंग उसकी जुबान है। उसके रंग चित्रों के रास्ते दर्शकों से बात करते हैं। वह रंगों का नया संसार बनाता है जो प्रकृति प्रदत्त होकर भी प्रकृति का अनुगामी नहीं है। यहां स्वामीनाथन के हवाले से इस बात को और अधिक समझा जा सकता है कि ‘कला प्रकृति का वो आईना है जिसमें प्रकृति खुद को नहीं देख सकती’

प्रकृति में मौजूद रंगों का अपरिमित अपूर्व अनुभव सबके लिए उपलब्ध है किन्तु उसे देखना कम लोगों को नसीब होता है। और देख लें तो सम्बन्ध बनाना। और सम्बन्ध बना लें तो आत्मसात्‍ करना। और यदि आत्मसात् कर भी लिया तो कैनवास पर अपनी मर्जी से उसे उतार पाना अत्यंत जटिल और धीमी और लम्बी प्रक्रिया है।

एसएच रज़ा इस देखने, संबंध बनाने और आत्मसात् करने की प्रक्रिया से संभवत: अपने बचपन में ही गुजरे। उनके पिता जंगल महकमे में अफसर थे और रज़ा का बचपन मण्डला के उन घने जंगलों में भटकते, उन्हें जानते, समझते, देखते गुज़रा जिन जंगलों की बेतहाशा कटाई के बाद आज भी धूप ज़मीन तक नहीं पहुंचती है।1930 के जंगल की कल्पना आज वृक्षों के झुरमुट को जंगल समझने वाले लोग शायद ही कर सके।

रज़ा का बचपन पिता के सख्त अनुशासन में गुज़रा, लेकिन उनका मन पढ़ाई से ज़्यादा भटकाई में लगता था। उनके शिक्षक भी हैरान-परेशान रहते थे कि यह बालक कक्षा में कम जंगल में ज़्यादा मिलता है। प्रकृति का यह अनुभव जो रज़ा के चेतन का हिस्सा नहीं बनता है उनके अवचेतन के उन स्याह हिस्सों में जा रहने लगता है, जहां पहुंचने का प्रयत्न पूरा मनोविज्ञान अपनी निष्फल कोशिशों के बाद आज भी कर रहा है।

रज़ा का अवचेतन उस वक़्त जाग्रत होता है जब वे चित्र बना रहे होते हैं। उनकी चित्रकार यात्रा की शुरुआत दृश्य चित्रण के अनूठे, प्रभावशाली चित्रण के साथ ही दर्ज होती है। और प्रकृति का रज़ा के जीवन में गहरा हस्तक्षेप अन्त तक रहता है। वे कभी भी ‘प्रकृति-पुरुष’ की धारणा से बाहर नहीं हो पाए। उनके लिए ‘आदिशक्ति’ ही ‘विचित्र उन्माद’ में सहायक रही है। वे अक्सर कहा करते थे कि ‘कला विचित्र-उन्माद’ है।

यह विचित्र-उन्माद क्या है? इस पर हम थोड़ा विचार करें तो पाएंगे कि यह अनुभव भी रज़ा को अपनी भटकन के दौरान ही मिला होगा। घने जंगल के घनघोर अंधेरे के बीच पत्तियों से छनकर आती रश्मि किरणों की चमक से किसी सांप का सरक जाना, अचानक हवा का चल जाना, बंदर का इस डाल से उस डाली पर कूद जाना, ये सब विचित्र-उन्माद हैं। एक ऐसी हलचल, जो अप्रत्याशित हो। जिसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता हो, जिसके होने में करने का भाव न हो, उन्मादी क्षण है। जो चमत्कृत कर देता हो, स्तब्ध कर देता हो। एक चिड़िया के अचानक उड़ जाने से बड़ा अचम्भा और क्या हो सकता है?

इस तरह की अनेकों घटनाएं रज़ा के मन में गहरे उत्कीर्ण हुई होंगी जिन्हें समझ पाना सामान्य व्यक्ति की समझ से बाहर है। फ्रायड का जीवन भी इसी अवचेतन के चेतन क्रियाकलापों को समझने में खर्च हुआ। फिर भी विचित्र-उन्माद का छोर पाना तो दूर उसके कयास भी अक्सर अलग निकले। रज़ा के इसी प्रकृति प्रेम ने उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ लिए जिनसे रज़ा का वह अनूठा, अप्रतिम रंगीन संसार खड़ा हुआ जिसे हम जानते हैं।

जिन दिनों दृश्य चित्रण की छात्रवृत्ति पर रज़ा हिन्दुस्तान के अनेक प्रदेशों में घूम रहे थे, चित्रित कर रहे थे, उसी दौरान कश्मीर में उन्हें कार्तिय ब्रेसां मिले, प्रसिद्ध फ्रांसीसी फोटोग्राफर, उन्होंने रज़ा के सैरां देखें और कहा कि इन चित्रों में ‘कंस्ट्रक्शन’ की कमी है। इनका आधार ‘संरचना’ होनी चाहिए। रज़ा जो अपने जुनून में चित्र बनाने वाले युवा छात्र थे उनके लिए यह समझना मुश्किल था कि चित्र में ‘संरचना’ क्या होती है? ब्रेसां भी कम गुरू न थे। उन्होंने सलाह दी कि संरचना को समझने के लिए चित्रकार सेजां के चित्रों को देखो। और सेजां के चित्र देखने का उतावलापन उन्हें फ्रांस ले गया। वे मुम्बई लौटे, पता चला कि फ्रांसीसी दूतावास हर वर्ष अध्ययन के लिए वर्ष की छात्रवृत्ति देता है और छात्रवृत्ति पाने के लिए फ्रांसीसी भाषा आना ज़रूरी है। सो रज़ा ने फ्रांसीसी भाषा सीखनी शुरू की।

प्रकृति रज़ा के साथ थी और रज़ा की प्रकृति जिज्ञासा से भरी थी। छात्रवृत्ति के साक्षात्कार में उन्होंने इतनी साफ़ फ्रांसीसी बोली कि समिति ने उन्हें एक वर्ष की जगह दो वर्ष की छात्रवृत्ति स्‍वीकृत कर दी। अड़तालिस में दृश्य-चित्रण के लिए हिन्दुस्तान भर घूमना, मुंबई में पहली प्रदर्शनी करना और पचास में रज़ा पेरिस में बाल्ज़ाक का मूर्तिशिल्प देख रोदां के मुरीद हुए जा रहे थे। लूव्र और म्यूजे डोरसे देख प्रसन्न हो रहे थे। सेजां के चित्रों को उन्होंने न सिर्फ देखा बल्कि समझा और संरचना के महत्व को जाना। इसके कारण रज़ा के चित्रों का दृश्य बदल गया। अब तक किए जाने वाले दृश्य चित्रण में रज़ा की ‘अप्रोच’ में लापरवाही और रंग चुनाव के प्रति अनासक्ति दिखाई देती थी। लेकिन रज़ा के फ्रांसीसी दृश्य-चित्रण में संरचना का प्रमुख स्थान है। रंग-चुनाव में सजगता है। ‘अप्रोच’ में जाग्रति है।

अब रज़ा के चित्रों से अनायास बाहर हो गया और उन्हें फ्रांस की महत्वपूर्ण वार्षिक प्रदर्शनी में ‘प्रि दिला क्रितिक’ पुरस्कार मिला। इस पुरस्कार का महत्व वार्षिक पुरस्कारों से चौदह गुना ज़्यादा होता था जिसका सीधा कारण यह था कि इस पुरस्कृत कलाकृति का चुनाव फ्रांस के चौदह कला-समीक्षक करते थे।

पाठकगण इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि चौदह धुरंधर कला-समीक्षकों का किसी एक कलाकृति पर एकमत होना कितना मुश्किल और कितनी असम्भव प्रक्रिया का हिस्सा है। इन चौदह कला-समीक्षकों की प्रवृत्ति और प्रकृति रज़ा की चित्र-प्रकृति पर एकमत थी। यह रज़ा के जीवन की महत्वपूर्ण घटना थी।

रज़ा की यात्रा का उन्माद भी रज़ा की प्रकृति का अंग है। तांत्रिक कला के संपर्क में आकर रज़ा ने अपनी मिट्टी की महक को जानना शुरू किया। अजीत मुखर्जी की एक पुस्तक में छपे चित्रों से हुआ परिचय रज़ा के लिए नया संसार खोल चुका था। इसमें दर्शन का बड़ा हिस्सा रज़ा की एकान्तिक प्रकृति से मेल खा रहा था। रज़ा के लिए यह सब सहज और सम्भाव्य था कि वे ‘प्रकृति-पुरुष’ को चित्रों में जगह दें। रज़ा के चित्रों से फ्रांसीसी दृश्य अब बाहर जा चुके थे। उनकी जगह ज्यामिति रूपाकारों से निर्मित राजस्थान, सतपुड़ा, विंध्यांचल, अरावली, सौराष्ट्र नामक कलाकृतियां जन्म ले रही थीं। तांत्रिक संरचना ने रज़ा के चित्रों पर अधिकार जमा लिया और उसमें रंगों का विस्मयकारी तत्व उभरकर सामने आने लगा।

यह समय रज़ा के रज़ा बनने और रंगों के उद्घाटित होने का समय था। रज़ा रंग को जादूगर की तरह लगाते हुए एक के बाद दूसरी कलाकृति बना रहे थे, जिनमें प्रकृति के रंगों का नया अनुभव प्रकट हो रहा था। सफ़ेद रंग की आक्रामकता के सामने लाल रंग का कौमार्य ठिठका खड़ा था। नीले रंग जल रहे थे। हरा रंग सुलग रहा था। दुनिया के किसी चित्रकार ने रंगों के स्वभाव में इस कदर उलट-फेर न की थी। वे रंगों की शुद्धता के क़ायल रहे मगर रंगों को नया अर्थ देने का जोख़िम भरा रुचिपूर्ण काम भी कर रहे थे। यह रज़ा का बचपन था जो प्रौढ़ रज़ा में प्रकट हो रहा था। यह मण्डला के जंगलों की प्रकृति थी जो ज्यामिति रूपाकार और तान्त्रिकी संरचना में रज़ा के मनोभावों के भीतर उथल-पुथल मचाए हुए थी।

प्रकृति का संयमित, सुलझा, संक्रमित करता उन्माद रज़ा के मन-प्राण में जा बसा था जिसे अपनी राह मिली थी लगभग चालीस साल बाद। इन चालीस वर्षों में रज़ा ने प्रकृति के साथ अपने संबंध को लगातार प्रगाढ़ और प्रखर किया। रज़ा दक्षिणी फ्रांस के ऐसे इलाके में अपना ‘समर-हाउस’ बनाने को तत्पर थे जो मण्डला जैसे जंगलों और पहाड़ों के बीच हो। और उन्होंने बनाया भी गोरबियो में अपना घर जो बचपन की आबो-हवा की स्मृति से भरा था। गांव का ठहरा-धीमा-सा जीवन उन्हें अपने चित्रों पर एकाग्र होने के लिए लगातार उकसाता रहा और रज़ा ने इसी परिवेश में अपने चित्रों के अंतिम पड़ाव में प्रवेश किया जो बिन्दु-मय था। जो रज़ा के चित्रों के घनघोर व धैर्यधर दर्शक रहे हैं वे जानते हैं कि ‘बिन्दु’ उनके चित्रों में शुरू से मौजूद है। यह ‘बिन्दु’ अड़तालीस का दृश्य चित्रण हो, फ्रांसीसी दृश्य चित्रण, तान्त्रिक ज्यामिति चित्र हों, हर जगह रहा है। कभी सूरज की तरह, कभी गोले की तरह, कभी बिन्दु की तरह। इन आखिरी वर्षों के चित्रों का प्रधान बिम्ब बिन्दु से भी उनका नाता बचपन का ही रहा।

बदमाश रज़ा को कक्षा में बैठा पाना या विद्यालय में मौजूद देखना किसी शिक्षक के बस में न था। भागते रहने, मस्ती करने और अन्य विद्यार्थियों को भटकाने में माहिर रज़ा को उनके शिक्षक ने एक गुरूमंत्र दिया। उन्होंने विद्यालय की दीवार पर कोयले से बिन्दु बनाकर रज़ा को उसे एकटक देखते रहने की सजा मुकर्रर की। यह सजा ही ऐसी थी जो रज़ा को स्कूल में बांध सकी। और उस वक़्त रज़ा या उनके शिक्षक को भी पता न था कि यह सज़ा रूपी बिन्दु उनके जीवन को बांध लेगा। स्कूल का यह बिन्दू रज़ा के उत्तरार्ध में सज़ा की तरह नहीं लौटा। अब वह ‘प्राण-बिन्दु’ था।

रज़ा पर दोहराव के आरोप भी लगे किन्तु इस बिन्दू-शक्ति में लीन रज़ा दुनियावी आरोप-प्रत्यारोप से परे ‘बिन्दू-भक्ति’ में मस्त थे। इस दौरान उनके चित्रों में सिर्फ़ बिन्दु का ही महत्व नहीं था, रंगों का भी था। अब रंग-रंग नहीं बचे थे वे रज़ा स्वभाव का अंग थे। दर्शक इन रंग-प्रयोगों से चमत्कृत होता था। गा-सा खड़ा रह जाता। मानो जंगल के धूप-छांवी अंधेरे में किसी सरकते सांप का चमकता अंग देख लिया हो। या स्वामीनाथन के शब्दों में फूल की दो पंखुड़ियां तितली बन उड़ गई हों। वह हतप्रभ है। इस सरकने, उड़ने, भटकने पर। रंगों की यही सरकती समझ रज़ा के चित्रों का सार है। ये सार-बे-तार है। दर्शक से जुड़ता है। दर्शक अनुभव के इस अनोखे रूप को देख अटक जाता है।

इन्हीं रज़ा की पुण्यतिथि पर हम सब रज़ा की रंगीन दुनिया के मुरीद बाशिन्दे कृतज्ञतापूर्वक उन्हें याद करते हैं। हर वर्ष मण्डला में 23 जुलाई की सुबह, जो अक्सर गीली ही रहती है, कभी बारिश से कभी स्मृति के भीगे प्रकोष्ठों से। 
 
(इस आलेख के लेखक प्रसिद्ध च‍ित्रकार हैं।)

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