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पं.शिव कुमार शर्मा : संगीत के दो हंसों की जोड़ी बिखर गई ऐसे...

स्वरांगी साने
किसी दुःखद प्रसंग में भी किसी की सुखद स्मृतियां याद आने लगे तो समझ लीजिए उस व्यक्ति का वलय कितना सकारात्मक, ओजवान् रहा होगा। संतूर के जनक कहलाने वाले शिवकुमार शर्मा चले गए...वे तो चले गए लेकिन साथी से भी अधिक कोई गहरा रिश्ता हो तो ऐसे मित्र बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया की क्या गत होगी यह सोच तक पाना दुरूह है, शिव-हरि की जोड़ी ऐसी ही थी जैसे संगीत के दो हंसों की जोड़ी हो कि एक के बिना दूसरे की कल्पना शरीर बिन प्राण है। हरि प्रसाद चौरसिया के शिष्य प्रसिद्ध बांसुरी वादक संतोष संत अपने गुरु की दशा पर और गुरु सम शिव कुमार शर्मा के न होने पर अपनी आंखों की भीगी कोर को छिपा नहीं पाते। इंदौर में अपने निवास पर लगभग दूसरे गुरु शिवकुमार शर्मा को याद करते हुए उनका कंठ रुंध जाता है और वह फीकी हंसी के साथ कहते हैं बांसुरी बजाने से कलेजे का डायफ्राम धीरे-धीरे ही मजबूत होता है।
 
उनका यह वाक्य उधेड़बुन में डाल देता है कि कलेजा मजबूत हो पाता है या नहीं...संतोष जी पनीली आंखें लिए बताते हैं संगीत को लेकर मेरे मन में जो भी प्रश्न होते थे उनके जवाब तलाशने के लिए हरि प्रसाद जी मुझे कहते थे कि शिवजी से पूछो। शिव जी संगीत चिंतक थे। मैंने उनसे पूछा कि बड़े कलाकार, पंडित सब लोग बहुत जल्दी बन जाते हैं, ऐसा करने के लिए कितने घंटे रियाज़ करना चाहिए। शिवजी ने बताया आदमी की तरह रियाज़ करोगे तो तीन घंटे का रियाज़ भी काफ़ी है और गधे की तरह करोगे तो 24 घंटे भी कम है। शिवजी मानते थे कि जिस पर बचपन से जैसे संगीत के संस्कार पड़ते हैं वह उन्हीं सुरों में बहने लगता है। शिवजी इसके लिए उदाहरण देते थे किसी को इडली वडा अच्छा लगता है, किसी को लॉलीपॉप, किसी को बर्फ़ का गोला...बचपन से जिसे जो अच्छा लगता है, बुढ़ापे में भी वह उसे खाना ही पसंद करेगा। ऐसे ही संस्कार होते हैं, जिसे जिसके संस्कार मिलते हैं, वह उस ओर मुड़ता है।
 
संतोष जी बताते हैं कि आकाशवाणी पर उनकी नियुक्ति पहाड़ी इलाके में हुई थी, वहीं शिवजी का घर था, ससुराल था। शिवजी पहले तबला बजाते थे और उनकी रिकॉर्डिंग रेडियो में सुनता था। शिवजी का तज़ुर्बा था कि पहाड़ जब चढ़ते हैं तो झुकना पड़ता है और उतरते हैं तो पीछे की ओर तनना पड़ता है। समझ लो कि विनमर् हो तब तक चढ़ाई है, यदि सीना तान लिया तो मान लो ढलान शुरू हो गई। 
 
शिवजी के बेटे राहुल की शादी का किस्सा संतोष जी सुनाते हैं राहुल की शादी में हरिजी ने कहा कि उन्होंने नेवी के कमांडर से बात कर ली है, वातानुकूलित बस करवा दी है, तुम चुपचाप जाकर नेवी का बैंड ले आओ। मुंबई के कोलाबा में नेवी का सेंटर है, उस समय मैं भी मुंबई आकाशवाणी में था तो सारे बैंड को वातानुकूलित गाड़ी में लेकर चुपचाप वहां पहुंच गया, नेवी के म्यूज़िशियन से कहा उतरिए और मैं ढूंढने लगा, किसे तो मैंने कहा हरिजी को और देखा शिवजी बाहर खड़े अतिथियों का स्वागत कर रहे थे और कन्यादान हरि जी ले रहे थे। शादी शिवजी के बेटे की थी, कन्यादान हरि जी ले रहे थे, ऐसा गहरा नाता था उन दोनों में। मैं म्यूज़िशियन को लेकर बगीचे में गया और जैसे ही शादी होने लगी मैंने उनसे कहा बैंड बजाइए। तब तक वे जान गए थे कि यह शिव-हरि के परिवार की शादी है और उन्होंने सिलसिला मूवी के गीतों का सिलसिला शुरू कर दिया।

नेवी के बैग पाइपर (मशक) पर नीला आसमान, ये कहां आ गए हम..जैसे गीत और सुरीले लगने लगे। फिर तो अमिताभ बच्चन का परिवार आया, रेखा आईं, यश चोपड़ा आए और पूरा माहौल सिलसिलामय हो गया। शिवजी पूछने लगे यह क्या है, हरिजी मुस्कुराने लगे...हरिजी खुद पूछ रहे हैं यह क्या है..शिव चले गए हैं और हरिजी मुस्कुरा नहीं पा रहे हैं...

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