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एक थी अमरा

गिरीश पांडेय
छोटा कद, गठीला शरीर, जामुनी रंग, चेहरे पर हमेशा हंसी। इस हंसी की वजह से उसके मोती जैसे दांत चमकते रहते थे। उसके जामुनी रंग में एक खास चमक थी। हंसते हुए चेहरे के बीच मोती जैसे दांत उस रंग को और चटक बना देते थे। वह तड़के काम वाली महिलाओं के समूह के साथ एक झोपड़पट्टी से निकलती थी। बारी-बारी से सब उन घरों में चली जातीं जहां वे काम करती थीं। मेरे घर में काम करने वाली का नाम था अमरा। उम्र करीब 25 साल के आस-पास रही होगी।
 
अमरा की यह दूसरी शादी थी। पहली क्यों टूटी, यह कभी हमने जानने की कोशिश भी नहीं की। नारी के सबसे बड़े सुख-मातृत्व—से वंचित अमरा अपनी दूसरी शादी से भी खुश नहीं थी।
 
बात 1990 की है। उस समय मैं भोपाल के रचना नगर कॉलोनी में रहता था। मेरे साथ शुरू में बृजेश राजपूत रहते थे। बाद के दिनों में आलोक सिंघई भी आकर जुड़ गए। हम तीनों सागर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के क्लासमेट थे। मैं और बृजेश राजपूत उस समय दैनिक नईदुनिया में काम करते थे। मेरे लिए पत्रकारिता के बिल्कुल शुरुआती दिन थे—मात्र कुछ महीने। उम्र में छोटे बृजेश इस लिहाज से हमसे कुछ महीने सीनियर थे। मैं जनरल डेस्क पर था, जबकि बृजेश रिपोर्टिंग में। आलोक भी हमारे साथ रहते हुए अपनी राह तलाश रहे थे।
 
कब और कैसे अमरा हमारे घर मेड के रूप में आने लगी? कब हम उस पर पूरी तरह निर्भर हो गए? कब वह मेड से मालकिन बन गई? याद नहीं। हर पत्रकार की तरह हमारी दिनचर्या भी अव्यवस्थित थी। जैसा जिसके ऑफिस जाने का क्रम था, वैसा ही सोने का भी। अमरा के सुबह आने का वक्त करीब 9 बजे था। उस समय मैं नींद में होता था, और मेरे दोनों मित्र तंद्रा में। दरवाजा खटखटाने से नींद न टूटे, इसलिए जो पहले जागता वह दरवाजा खोल देता। अमरा दबे पांव आती। बेआवाज, धीरे-धीरे बर्तन धोती। चाय तैयार करके वह आवाज देती, भैया, चाय तैयार है। उठो, पी लो। यह आवाज उसे खाना बनाते समय किचन से कई बार लगानी पड़ती।
 
दोपहर बाद हममें से कोई घर पर नहीं रहता। अमरा पर इतना यकीन था कि हम कमरे की खिड़की खोलकर एक जगह ताले की चाबी टांग देते। शाम को अमरा कब आई, कब काम कर चली गई—यह हमें सिर्फ छुट्टियों के दिन पता चलता।
 
धीरे-धीरे हम अमरा पर पूरी तरह निर्भर हो गए। न सब्जी की चिंता, न राशन की, न किरासन (मिट्टी के तेल) की। वह कभी किरासन का खाली डिब्बा देखकर, तो कभी राशन खत्म होने पर झुंझला जाती। पूछने पर हमारा—खासकर मेरा—टका सा जवाब होता, "रहने दो, खाना नहीं बनेगा।" यह सुनकर अमरा और झुंझला जाती। हार मानकर कहती, "पैसे दो, लाती हूं। भूखे कैसे चलेगा?" पैसे लेकर वह जरूरी सामान लाकर झटपट रसोई बना देती, और हंसते हुए चली जाती।
 
एक बार अमरा ने बताया कि उसके पति को हमारे यहां काम करने से ऐतराज है। इसके लिए वह गाली-गलौज तो अक्सर करता है, कभी-कभी मारपीट भी। पति का कहना था कि उन लड़कों की जगह किसी परिवार वाले घर का काम पकड़ लो। पर अमरा को न जाने क्यों हमारी अव्यवस्थित गृहस्थी से प्रेम हो गया था। एक दिन उसने कहा कि आज दिन में काम पर नहीं आऊंगी। तबीयत ठीक नहीं है, डॉक्टर को दिखाना है। लेकिन दिन के 11 बजे नए कपड़ों और मामूली मेकअप के साथ अमरा नमूदार हुई। देखकर हैरत हुई। पूछा, "तुम तो आने वाली नहीं थीं?" उसने कहा, "न आती तो खाते क्या? सिर्फ तुम लोगों के घर आई हूं। कोई और पूछे तो बताना नहीं।"
 
मैं कुछ महीने बाद ही भोपाल से अमर उजाला, कानपुर आ गया। फिर एक बार सिर्फ सामान लेने गया, तभी अमरा से अंतिम मुलाकात हुई। बाद के कुछ पत्रों में बृजेश ने उसका जिक्र किया। बाद में बृजेश दिल्ली चले गए और आलोक संभवतः सागर। हम मित्र तो अब भी जुड़े हैं, पर अमरा अपनी स्निग्ध मुस्कान, निश्छल प्यार, निर्दोष और निष्पाप आंखों के साथ सिर्फ यादों में। यकीनन वह जहां होगी, खुश ही होगी।

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