Dharma Sangrah

पहचानो, देशद्रोहियों और छद्मवेश में छुपे दुश्मनों को

Webdunia
सोमवार, 26 सितम्बर 2016 (15:13 IST)
-डॉ. मनोहर भंडारी 
 
सुबह के 4 बजे होंगे, मैं सुख की नींद सो रहा था। अचानक किसी ने कंधे पकड़कर झिंझोड़ा, फिर कुछ ही पलों बाद मेरे मुख-मंडल पर ढेर सारा पानी डाल दिया, उठने की क्रिया शुरू की ही थी कि एक जोरदार लात मुझे मारी गई। मैं हड़बड़ाहट में क्रोध में चीखते हुए जागा तो झन्नाटेदार झापट ने दिन में तारे दिखा दिए। सामने आचार्य चाणक्य खड़े थे और उनकी आंखें क्रोध से लाल हो रही थीं, मुट्ठियां तनी हुई थीं। 
मैंने डरते हुए पूछा, आचार्यश्री आपको मेरी नींद से क्या आपत्ति है, आखिर मैंने क्या किया है? 
 
मूर्ख! कायर! कृतघ्न! सुविधाभोगी! देश की अस्मिता खतरे में है और तू चादर ओढ़कर सुख की नींद सो रहा है। 
 
मेरे मुंह से तुरंत निकला, तो मैं क्या करूं? 
 
मूढ़मति! महाकृतघ्न! मैं क्या करूं, मुझे क्या करना है, मैं कर भी क्या सकता हूं, मुझे क्या लेना-देना, ऐसे कायरताभरे शब्द-समूहों ने, पलायनवादी सोच ने, ऐसी निर्लज्ज निस्पृहता ने देश को लज्जाजनक स्थिति में पहुंचा दिया है। 
 
उन्होंने पुछा, क्या तुम इस देश में नहीं रहते हो? क्या देश की अस्मिता पर आ रही आंच को तुमने अनुभव नहीं किया है? क्या सीमा पर दिन-रात पहरा देने वाले सैनिकों के कारण तुम और तुम्हारे पत्नी-बच्चे सुख की नींद नहीं सोते हैं? क्या ऐसे सैनिकों की नृशंस हत्या से तुम्हें उद्वेलित नहीं होना चाहिए? 
 
पर... पर... आचार्यश्री, ये बात आप सरकार को बताइए। वो ही कुछ ठोस कार्रवाई कर सकती है, मैं भला क्या कर सकता हूं? 
 
धिक्कार है तुम जैसे नागरिकों को। हे भारतमाता, तू निपूती रह जाती तो अच्छा था, कितनी कृतघ्न संतानें तेरी गोद में पल रही हैं? 
 
रे मूढ़! सरकार को तो सब पता है, वो अपना काम कर रही है, परंतु तेरा कुछ कर्तव्य है या नहीं। कामचोर, अंधे, कर्तव्यविमुख, धूर्त! तू जहां है, तू जो है, तू जो कर सकता है, वह क्या तुझे नहीं करना चाहिए?
 
आचार्यश्री पहेलियां मत बुझाइए, मुझे सीधे-सीधे बताइए। 
 
रे पलायनवादी, डरपोक मानव! रे शुतुरमुर्ग! तुझे अपने स्वार्थ की गूढ़ बातें भी सहजता से समझ में आ जाती हैं। मुझे अनुमान है कि तूने सातवें वेतन की सारी गणनाएं अवश्य कर ली होंगी और यह भी कि सेवानिवृत्ति पर कितनी पेंशन मिलेगी, कितनी ग्रेच्युटी मिलेगी। परंतु लोकतंत्र में जनता का जागना और जनता का अभिमत कितना महत्वपूर्ण और अनिवार्य है, यह तू नहीं जानता है, क्या? या जान-बूझकर अनभिज्ञ बन रहा है। तुझे यह समझ नहीं आएगा, क्योंकि तेरा संसार राष्ट्र से सिमटकर अपनी घर-गृहस्थी और बैंक-बैलेंस पर ही केंद्रित हो चुका है। 
 
तनिक प्याज का भाव बढ़ा तो तुम्हें देश रसातल में जाता नजर आता है। दाल के भाव से तुम्हारे जीवन की नैया डगमगाने लगती है और तुम लोकतंत्र और सरकार को उसकी औकात बता देते हो। यही ना! क्या माता सरस्वती की कृपा को वृथा जाने दोगे? क्या जनता को अपनी कलम से जगाओगे नहीं? आज मेरे पास समय नहीं है, तुम जैसे न जाने कितने लोगों को कुंभकर्णी निद्रा से जगाना है। 
तो सुनो। जनता को, तथाकथित बुद्धिजीवियों को, कथित जागरूकों को सचेत करो, उन्हें जगाओ। वे अपने-अपने संपर्कितों को जगाएं, उन्हें बताएं कि देश में छुपे देशद्रोहियों का सामाजिक बहिष्कार करें, उनका तिरस्कार करें, उनसे किसी भी प्रकार का व्यवहार न करें, उनको धन, बल-संबल देने वाला कोई भी कार्य कदापि नहीं करें। 
 
मुझे ज्ञात है कि यदि मैं तुम्हें कहूंगा कि तुम घर-घर जा-जाकर ये बातें लोगों को बताओ तो तुम्हारा अविलंब बहाना होगा कि मैं व्यस्त हूं, मेरी मर्यादाएं हैं, मैं विवश हूं आदि-आदि विवशताएं प्रस्तुत कर दोगे इसलिए मैंने तुम जैसे कापुरुषों के सर्वथा अनुकूल घर बैठे करने वाला बहुत ही सरल उपाय सोचा है, वही बता रहा हूं। 
 
अच्छा तनिक यह तो बताओ कि तुम्हारे कुल कितने फेसबुक फ्रेंड्स हैं? 
 
मैंने कहा, आज की तिथि तक 3,548 हैं। 
 
ठीक है, आज रात सोने से पहले घर के द्वार पर भीतर से ताला लगाकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर लेना और उसके पश्चात फेसबुक पर देशद्रोहियों की मेरे द्वारा प्रतिपादित विस्तृत परिभाषा को पोस्ट करना और अपने सभी फेसबुक फ्रेंड्स से निवेदन करना कि उन्हें अपनी जन्मदात्री माता और धात्री वसुंधरा की सौगंध है कि इसे अवश्य शेयर करें।
 
मैंने रिरियाते हुए कहा, जी आचार्यश्री, बताइए।
 
लिखो-
 
•वे सभी लोग देशद्रोही हैं, जो आतंकवाद और आतंकवादियों के मुखर या मूक समर्थक हैं और वे भी जो सक्षम और नैतिक रूप से जिम्मेदार होते हुए भी आतंकवाद पर जान-बूझकर चुप्पी साधे हुए हैं।
•वे सभी लोग देशद्रोही हैं, जो यह मानते हैं कि सेना और पुलिस के जवानों का कोई मानव अधिकार नहीं होता है। 
•वे सभी लोग देशद्रोही हैं, जो सेना और पुलिस के जवानों को बम या गोलियों से छलनी करने वालों के परोक्ष या प्रत्यक्ष समर्थक हैं।
•वे सभी लोग देशद्रोही हैं, जो सेना के जवानों को पत्थरों की मार सहते ही रहने के परोक्ष या प्रत्यक्ष पक्षधर और समर्थक हैं।
•वे सभी लोग देशद्रोही हैं, जो सेना के जवानों द्वारा दीर्घकालीन पत्थरबाजी के प्रतिकारस्वरूप की गई कार्रवाई को अवैधानिक अथवा मानवीय अधिकारों का उल्लंघन मानते हैं। 
•वे सभी लोग देशद्रोही हैं, जो सेना के जवानों का उपहास उड़ाते हैं या उनका मनोबल तोड़ने का प्रयास करते हैं या जो उनकी सोते हुए नृशंस और अमानवीय हत्या का मुखरता से विरोध नहीं करते हैं। ऐसे लोगों को तो भारत की सीमा और शत्रु देश की सीमा के बीच शहर बसाकर वहां रहने के लिए विवश कर देना चाहिए, क्योंकि सेना के विरोधियों को भारतीय सैन्य सुरक्षा की भला क्या आवश्यकता है? 
•वे सभी लोग देशद्रोही हैं, जो असहिष्णुता के नाम पर देश के वातावरण को अस्थिर करने में गहरी रुचि रखते हैं।
•वे सभी लोग देशद्रोही हैं, जो कम समय में अनपेक्षित रूप से हुई अरबों रुपयों की कमाई से हुए अफारे और अपच को असहिष्णुता बताते हैं तथा सैनिकों अथवा हिन्दू नागरिकों की नृशंस हत्या को सहज, स्वाभाविक और सहनीय मानकर चुप्पी साधे रहते हैं।
•वे सभी छलबुद्धि के स्वामी तथाकथित बुद्धिजीवी देशद्रोही हैं, जो स्वार्थसिद्धि नहीं होने की स्थिति को देश की गंभीर समस्या में परिणत कर, उसका विश्वस्तर पर प्रचार करने में सिद्धहस्त हैं। 
•वे सभी लोग देशद्रोही हैं, जो शत्रु देश के दशकों के छद्मयुद्ध के प्रतिकार के लिए सरकार द्वारा की जा रही किसी भी कार्रवाई का विरोध, मानवीय मूल्यों या अधिकारों का उल्लेख कर करते हों, चाहे वह गोलीबारी हो या पानी रोकने संबंधी संधि के उल्लंघन की बात हो, सबसे पहले तो ऐसे कृतघ्नों का दाना-पानी ही अवरुद्ध कर देना चाहिए।
•मेरी दृष्टि में वे सारे लोग देशद्रोही हैं, जो अपने ही देश के योग्य नागरिकों की घोर उपेक्षा कर तथा उनके अधिकारों का हनन कर अविश्वसनीय और नापाक पड़ोसी के नागरिकों को भारत में धन कमाने का सुअवसर प्रदान करते हैं।
•जो बहुसंख्यक हिन्दुओं की सहिष्णुता को उनकी विवशता समझें या दुरुपयोग करें और हिन्दू देवी-देवताओं का सार्वजनिक रूप से उपहास करें, वे भी देशद्रोही हैं।
•शत्रु देश की जय और भारतमाता के अंग-भंग के नारे लगाने वाले भी देशद्रोही ही हैं। 
•वे पुनः बोले, मेरा मंतव्य समझो और अपने चिंतन से ऐसे ही अन्य कृत्यों को भी देशद्रोह की परिसीमा में लाओ। लेखक हो, राष्ट्र के प्रति अपना कर्तव्य निभाओ, जन-जन को जगाओ। 
 
अचानक उनकी भाव-भंगिमा दुर्वासा-क्रोध में परिणत हो गई और मेरी ओर उंगली उठाते हुए बोले- मेरी दृष्टि में तुम जैसे वे सभी स्वार्थी, सुविधाभोगी, पलायनवादी, कर्तव्यविमुख और महामूढ़ नागरिक धिक्कार के योग्य हैं, जो ऐसे लोगों के साथ व्यवहार कर उन्हें समृद्ध करने का काम इतना सब होते हुए भी निरंतर करते ही जा रहे हैं।
 
इतना कहते ही वे अंतर्ध्यान हो गए और मैंने घंटों तक लात की वेदना को सहलाते-सहलाते पोस्ट को लिखा है। आप मेरी पीड़ा को समझें और इसे अवश्य शेयर करें अन्यथा मेरी आने वाली न जाने कितनी रातें, लातें खाते हुए बीतेंगी। 
 
मुझे अपेक्षा है और विश्वास है कि आप मुझे लातों से अवश्य बचाएंगे।
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