Biodata Maker

नई कविता : नदी और मैं ....

शैली बक्षी खड़कोतकर
एक नदी बहती है
मेरे भीतर, अनवरत 
पुण्य सलिला-सी स्निग्ध
मंद-मंथर बहाव,
सिर्फ सतह पर।

कौन जाने गहराई में इसके 
कितने भंवर समाए हैं। 
डूबती-उतरती हूं मैं, निरुपाय 
कितना वेग है 
इसके प्रवाह में,
तटबंध तोड़ने को आतुर। 
मै थामे रहती हूं,
इस अतिरेकी जलधारा को।
जानती हूं, तटबंधों का टूटना 
विनाश का पर्याय है। 
अर्घ्य देती हूं नेत्रकोरों से।
उफनती धारा, उत्पाती भंवर 
विराम लेते हैं कुछ क्षण, 
और नदी फिर बहने लगती है 
पुण्य सलिला-सी। 
Show comments
सभी देखें

जरुर पढ़ें

गर्मियों में आइस एप्पल खाने के फायदे, जानें क्यों कहलाता है सुपरफ्रूट

आम का रस और कैरी पना, दोनों साथ में पीने से क्या होता है?

गर्मी के दिनों में फैशन में हैं यह कपड़े, आप भी ट्राय करना ना भूलें

क्या गर्मियों में आइसक्रीम खाना बढ़ा सकता है अस्थमा का खतरा?

कैंसर शरीर में कैसे फैलता है? जर्मन रिसर्च टीम ने किया नया खुलासा

सभी देखें

नवीनतम

गुड़ीपड़वा, नवरात्रि और चेटीचंड त्योहार के 10 प्रमुख व्यंजन

LPG गैस के बिना शाकाहारी व्यंजन: 10 स्वादिष्ट और सेहतमंद चाट रेसिपी

World Tuberculosis Day 2026: विश्व क्षय रोग (टीबी) दिवस: जानें कारण, महत्व, लक्षण, उपचार और रोकथाम

World Water Conservation Day: विश्व जल संरक्षण दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?

चैत्र नवरात्रि, गुड़ीपड़वा और चेटीचंड पर्व पर बेहतरीन हिन्दी निबंध

अगला लेख