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कैसे रोकें देश के 'बिगड़ते' युवा वर्ग को...

रीमा दीवान चड्ढा
कैसे बनते जा रहे हैं हमारे युवा? सवाल का जवाब यहां से आरंभ करती हूं कि महिला रचनाकार इस बात से परेशान हैं कि अगर रचना के साथ फोन नंबर छप जाए तो कई लड़के बिना कुछ सोचे फालतू बातें करने के लिए आधी रात को वक्त-बेवक्त परेशान करते हैं।

युवाओं का एक बड़ा वर्ग केवल बुरी बातों,बुरे कामों की ओर उन्मुख है। हर अच्छी बात में से भी बुरा निकाल कर गलत करने की सोचते हैं। समाज में नैतिकता नाम की इक चीज़ हुआ करती थी कभी। आज के दौर में जाने कहां गुम हो गई... हमारे कर्णधारों ने आज़ाद देश में गणतंत्र की बात तो की,संविधान भी रचा पर नियम,कायदे कानून केवल कागज़ों की शोभा बढ़ाते हैं। 
 
एक आयोजन में शरीक हुई। देखा भोजन की टेबल पर व्यंजनों का अंबार है। लोगों ने प्लेटों में ऊपर तक खाने की सामग्री भर दी। फिर जब खाया न गया तो उठा कर सब फेंक दिया। जाने कितने समारोहों में कितना सामान हम यूं आधा खा कर फेंक देते हैं। बिना यह सोचे कि इस अन्न को उगाने वाला कहीं स्वयं ही भूखा तो नहीं रह गया। इसी रोटी की खातिर कहीं किसी पेड़ पर लटक कर उसने अपनी जान तो नहीं गंवा दी। 
 
कवि ....बड़े नाम वाले ....कार्यक्रम में अवसर पाते ही बसस एक रचना कहते कहते देर तक माइक नहीं छोड़ते ....अपनी अपनी हांकते हैं सब। दूसरे की बांचता कोई नहीं। किसी को साहित्य से लेना देना नही न किसी को समाज की फिक्र है। 
 
हम भारतीय अंदर से भ्रष्ट हो रहे हैं। चरित्रहीन बन रहे हैं। दोगले होते जा रहे हैं। चोर उचक्के और बदमाश की श्रेणी में आ रहे हैं। स्वार्थ और लोभ में लिप्त हैं। सबको केवल अपनी पड़ी है। 
 
हर व्यक्ति केवल अपने सुख की सोचता है। गणतंत्र पर तिरंगे को लहरा कर देशभक्ति का ढोंग करने से पहले एक बार हर व्यक्ति स्वयं सोचे ....मैं इस देश का कैसा नागरिक हूं.... मैंने इसके संविधान का क्या मान रखा है....क्या अपने अधिकारों की बात करते हुए मैंने अपने कर्तव्य भी पूरे निभाए हैं? 
 
मैं...  मैं ... मैं... कह कर अपनी डींग हांकने के बजाय आइए हम सब मिलकर सोचें कि इस देश की महानता का झूठा दंभ भरने के बजाय इसे सच में महान बनाने के लिए हम सब कैसे अपना योगदान दें ... 
 
हम इतने विशाल देश के करोड़ों भारतीय चाहें तो क्या नहीं कर सकते पर अपने स्वार्थ,अपने सुख की सोचते हम देश से दगा करते हैं। हर वह व्यक्ति जो अपने अंदर से ईमानदार नहीं है वह देश से दगा कर रहा है। अपनी भूमिका में हम कहां खड़े हैं आइए एक बार अवश्य विचार करें .... भाषणबाजी और नारों के बीच तिरंगे को लहराना ही देशभक्ति नहीं है। इस देश को सच्चे और अच्छे लोगों की ज़रूरत है जो ईमानदारी से अपना काम करें....आइए  हम भी एक कोशिश करें .....क्या रचनात्मकता का कोई बड़ा अभियान सफाई अभियान की तरह आरंभ किया जा सकता है? अगर हां तो वह पहल हमें ही करनी होगी....हम सबको करनी होगी अपने-अपने स्तर पर...  
 

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