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प्रेम कविता : मैंने इश्क़ किया

सलिल सरोज
मैंने इश्क़ किया और बस आग से खेलता रहा
एक घड़ी जलता रहा, एक घड़ी बुझता रहा ।।1।।
 
हुस्न को कहां इतनी अदीकतें अता हुई हैं
मैं खुद ही गिरता रहा और खुद ही संभलता रहा ।।2।।
 
खुशफ़हमी थी जब तक दिल-ए-बेकरार को
आप ही मचलता रहा और आप ही बहलता रहा ।।3।।
 
ये तमाशा यूं ही खत्म हो जाता तो क्या बात थी
आंख भी मिलाता रहा और नज़रें भी चुराता रहा ।।4।।
 
हथेलियों से आंखें बंद करके उसने क्या जादू किया
मुझे जगाता भी रहा और ख्वाब भी दिखाता रहा ।।5।।
 
ये सरापा कयामत नहीं तो और क्या है
मुझमें ही खोता रहा और मुझे भी चुराता रहा ।।6।।

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