Dharma Sangrah

रोमांस कविता : ये गुफ़्तगू क्या है...

सलिल सरोज
है नहीं यकीन तुमको है, नहीं यकीन मुझको,
फिर ये खत-दर-खत गुफ़्तगू क्या है।।1।।
 
पा ही लिया होता सब, जो तुमको पा लिया होता,
वरना सांसों में उभरता जुनूं क्या है।।2।।
 
खुदाई से मिला, पर खुदा ही कब मिला,
किसे कहते हैं और ये सुकूं क्या है।।3।।
 
सब अमन है मुल्क में, अखबार रोज कहता है,
शफ़ाक़त के माथे पे स्याह गेशूं क्या है।।4।।
 
कह गए महफिलों में सारी हसरतें यकीनन,
पर ग़जल का मक़सद और मौजूं क्या है।।5।।

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