shiv chalisa

कविता : आ जाती हैं कुछ यादें

Webdunia
-डॉ. रूपेश जैन 'राहत'
धूल की पर्तों के नीचे तस्वीरों में अहसास जगाती हुई,
ख़्वाहिशें कांधे पे लिए कुछ इठलाती हुईं,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।
 
चढ़ती हुई जवानी में फ़ितरतन नगमे गुनगुनाती हुई,
बेशर्मी में मुस्कुराते, गले लगते शर्माती हुई,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।
 
चादर पे जुम्बिशें, रात चांदनी जाती हुई,
शोख़ नखरे, बलखाती, हसरतें दौड़ाती हुईं,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।
 
कश्मकश में कतराती, इशारा दे जाती हुई,
दबे पांव आकर, शोला भड़काती हुई,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।
 
नजर उठा के देखो तो बेचैन कर जाती हुई,
हवा के रुख पे जज़्बात सजाती हुई,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

जरुर पढ़ें

Gas-free vegetarian dishes: LPG गैस के बिना बनने वाले 20 शाकाहारी व्यंजन

गैस सिलेंडर खत्म होने का डर छू मंतर! बिना LPG गैस के भी पक सकता है खाना, ये 7 तरीके हैं सबसे बेस्ट

घर में यदि गैस और इंडक्शन दोनों नहीं है, तो इन 5 आसान तरीकों से फटाफट पकेगा खाना

यदि खत्म हो गई है गैस तो परेशान न हो, बिना LPG के जल्दी से बनाएं ये 5 आसान डिश

घर पर बनाएं कीवी आइसक्रीम, जानिए इस सुपरफ्रूट के 6 हेल्दी फायदे

सभी देखें

नवीनतम

सृष्टि का आनंद बनाम आनंद की सृष्टि!

23 मार्च शहीदी दिवस: इंकलाब के तीन सूरज: जब फांसी के फंदे भी चूम लिए गए

भारतीय न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. वरुण जर्मन पुरस्कार से सम्मानित

चहक रहा है चूल्हा

परिंदे नहीं जानते कि उनकी मौत किसी सरकारी फाइल में दर्ज नहीं होगी

अगला लेख