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बलरामजी ने क्यों धारण कर लिया था हल, जानिए हल की कथा

अनिरुद्ध जोशी
हल से खेतों में खेती जुताई की जाती है इसीलिए हल भारतीय कृषक समाज का प्रतीक है। इसकी सहायता से बीज बोने के पहले जमीन की आवश्यक तैयारी की जाती है। हल का प्रयोग प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। राजा जनक और दशरथ के काल में भी हल के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। आओ जानते हैं बलरामजी के हल की कहानी।
 
 
1. कहते हैं कि श्रीकृष्ण गोपालक थे और बलराम कृषक। इसीलिए बलराम कृषकों के आराध्य हैं। हल से किसान खेत जोतते हैं। हल कृषि प्रधान भारत का प्रतीक है।
 
2. बलराम बहुत बलशाली थे। सामान्य व्यक्ति हल उठाकर उसे हथियार के रूप में प्रयोग नहीं कर सकता लेकिन बलरामजी उसे उठा उसका हथियार के रूप में प्रयोग कर लेते थे। बलरामजी ने गदा के साथ ही अपने हल को भी हथियार बना लिया था। उनके हल दिव्य था। 
 
3. श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम को बलदाऊ, बलभद्र, दाऊ, संकर्षण और हलधर भी कहा जाता है। हलधर इसलिए क्योंकि वे अपने पास हमेशा हल रखते थे। बलराम का सबसे प्रमुख अस्त्र हल और मूसल है।
 
4. भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी को बलरामजी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। वे शेषनाग के अवतार थे। इस दिन माताएं संतान की लंबी उम्र की कामना को लेकर हल षष्ठी का व्रत रखती हैं। देश के पूर्वी भाग उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में इसे ललई छठ और मध्य भारत में हरछट कहा जाता है।
 
5. कहते हैं कि एक बार कौरव और बलराम के बीच किसी प्रकार का कोई खेल हुआ। इस खेल में बलरामजी जीत गए थे लेकिन कौरव यह मानने को ही नहीं तैयार थे। ऐसे में क्रोधित होकर बलरामजी ने अपने हल से हस्तिनापुर की संपूर्ण भूमि को खींचकर गंगा में डुबोने का प्रयास किया। तभी आकाशवाणी हुई की बलराम ही विजेता है। सभी ने सुना और इसे माना। इससे संतुष्ट होकर बलरामजी ने अपना हल रख दिया। तभी से वे हलधर के रूप में प्रसिद्ध हुए।
 
6. दूसरी कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवती का पुत्र साम्ब का दिल दुर्योधन और भानुमती की पुत्री लक्ष्मणा पर आ गया था और वे दोनों प्रेम करने लगे थे। इसलिए एक दिन साम्ब ने लक्ष्मणा से गंधर्व विवाह कर लिया और लक्ष्मणा को अपने रथ में बैठाकर द्वारिका ले जाने लगा। जब यह बात कौरवों को पता चली तो कौरव अपनी पूरी सेना लेकर साम्ब से युद्ध करने आ पहुंचे। कौरवों ने साम्ब को बंदी बना लिया। इसके बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम को पता चला, तब बलराम हस्तिनापुर पहुंच गए। बलराम ने कौरवों से निवेदनपूर्वक कहा कि साम्ब को मुक्तकर उसे लक्ष्मणा के साथ विदा कर दें, लेकिन कौरवों ने बलराम की बात नहीं मानी। ऐसे में बलराम का क्रोध जाग्रत हो गया। तब बलराम ने अपना रौद्र रूप प्रकट कर दिया। वे अपने हल से ही हस्तिनापुर की संपूर्ण धरती को खींचकर गंगा में डुबोने चल पड़े। यह देखकर कौरव भयभीत हो गए। संपूर्ण हस्तिनापुर में हाहाकार मच गया। सभी ने बलराम से माफी मांगी और तब साम्ब को लक्ष्मणा के साथ विदा कर दिया। बाद में द्वारिका में साम्ब और लक्ष्मणा का वैदिक रीति से विवाह संपन्न हुआ।
 
7. बलराम की पत्नी रेवती कई युग बड़ी थी। वह सतयुग की महिला थी और लगभग कई फुट लंबी थी। गर्ग संहिता के अनुसार रेवती के पिता ककुद्मी सतयुग में अपनी पुत्री के साथ ब्रह्मा जी से मिलने गए। वहां उन्होंने रेवती के लिए किसी योग्य वर की प्रार्थना की। ब्रह्मदेव ने हंसते हुए कहा कि जितना समय आपने यहां बिताया है उतने समय में पृथ्वी पर 27 युग बीत चुके हैं और अभी द्वापर का अंतिम चरण चल रहा है। आप शीघ्र पृथ्वी पर पहुंचिए। वहां शेषावतार बलराम आपकी पुत्री के सर्वथा योग्य हैं। जब रेवती पृथ्वी पर आकर बलराम से मिली तो उनकी लम्बाई में बड़ा अंतर था। तब बलरामजी ने अपने हल के प्रभाव से रेवती की ऊंचाई 7 हाथ कर दी थी और बाद में दोनों को विवाह हुआ। 
 
8. रासलीला के समय वरुणदेव ने अपनी पुत्री वारुणी को तरल शहद के रूप में वहां भेजा। जिसकी सुगंध और स्वाद से बलरामजी एवं सभी गोपियां को मन प्रफुल्लित हो उठा। बलराम रासलीला का आनंद यमुना नदी के पानी में लेना चाहते थे। जैसे ही बलराम ने यमुना को उन सबके समीप बुलाया। यमुना ने आने से मना कर दिया। तब क्रोध में बलराम ने कहा कि मैं तुझे अपने हल से बलपूर्वक यहां खींचता हूं और तुझे सैंकड़ों टुकड़ो में बंटने का श्राप देता हूं।  यह सुनकर यमुना घबरा गई और क्षमा मांगने लगी। तब बलराम ने यमुना को क्षमा किया। परन्तु हल से खींचने के कारण यमुना आज तक छोटे-छोटे अनेक टुकड़ों में बहती है।

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