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ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
हम हुए तुम हुए के मीर हुए उसकी ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए ----मीर तक़ी मीर
है कौन मोतबर
है कौन मोतबर, करूँ किस पर यक़ीन मैं ग़ासिब भी है वही, जिसे समझा अमीन मैं -----जावेद नदीम
एक-दो शे'र ही बस अपने
एक-दो शे'र ही बस अपने मिसाली हो जाएँ कब ये ख़्वाहिश है के हम मोमिन-ओ-हाली हो जाएँ
लरज़ती हैं खिड़कियाँ
धमक कहीं हो, लरज़ती हैं खिड़कियाँ मेरी घटा कहीं हो, बदलता है सायबाँ मेरा ------ नश्तर ख़ानक़ाही
कहाँ मैख़ाने का दरवाज़ा
कहाँ मैख़ाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहाँ वाइज़ बस इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले
अफ़सानों की बातें हैं
वफ़ा, इख़लास, रस्म-ओ-राह, हमदर्दी, रवादारी ये जितनी भी हैं सब ऎ दोस्त,अफ़सानों की बातें हैं -------अदम
करता हूँ जमआ फिर
करता हूँ जमआ फिर जिगरे-लख़्त-लख़्त को अरसा हुआ है दावत-ए-मिज़गाँ किए हुए ------ग़ालिब
मोहब्बत नाम हो जाए
अभी तो दिल में हल्की सी ख़लिश मेहसूस होती है बहुत मुमकिन है कल इसका मोहब्बत नाम हो जाए
ज़र्रों से मोहब्बत
हमने बरसों इन्हीं ज़र्रों से मोहब्बत की है चाँद तारों से तो कल आँख लड़ी है यारो
पढ़ने को सात आसमाँ
पढ़ने को सात आसमाँ, लिखने को पाताल ले-दे के कुल ज़िन्दगी, पैंसठ- सत्तर साल
शिक्षक दिवस पर विशेष
पढ़ने वो मेरे पास आते हैं भाईचारे का, एकता का सबक़
शब में सूरज
शब में सूरज कहाँ निकलता है इस जहाँ में तो अपना साया भी
बरसा तो इक मोती बना
बरसा तो इक मोती बना जो सीपियों में क़ैद है, देखो मुझे फ़ितरत से मैं आवारा बादल था कभी
बुरा मैं हूँ दोस्तों
मेरी है क्या मजाल, बुरा मैं तुम्हें कहूँ तुम सब भले हो और बुरा मैं हूँ दोस्तों
ठोकर का जवाब
बेसबब सर को मेरे ज़ख़्मी किया ऎसा नहीं आज पत्थर ने दिया है मेरी ठोकर का जवाब
ग़ैर ने तुम को जाँ कहा
ग़ैर ने तुम को जाँ कहा, समझे भी कुछ के क्या कहा यानी के बेवफ़ा कहा, जान का ऎतबार क्या-----------ग़ा
हम सायादार पेड़
हम सायादार पेड़ ज़माने के काम आए जब सूखने लगे तो जलाने के काम आए - मुनव्वर राना
और सिर्फ़ शाइर तू
'फ़राज़' तूने उन्हें मुश्किलों में डाल दिया ज़माना साहिबे-ज़र और सिर्फ़ शाइर तू
बहुत उदास है
बहुत उदास है एक शख़्स तेरे जाने से --- ---------------- जो हो सके तो चला आ उसी की ख़ातिर तू
किस-किस को बताएँगे
किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम तू मुझसे ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
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