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Exit Poll: बंगाल में बदलाव की बयार की Inside story

पश्चिम बंगाल में क्यों जीत सकती है भाजपा?

विकास सिंह
शुक्रवार, 1 मई 2026 (18:53 IST)
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के फाइनल नतीजों के आने में भले ही अभी 48 घंटे से अधिक का समय बचा हो लेकिन बंगाल में बदलाव की बयार बहने लगी है। पहले रिकॉर्ड वोटिंग और फिर अधिकांश एग्जिट पोल में बंगाल में भाजपा की जीत की संभावना जताई जा रही है। क्या भाजपा पहली बार बंगाल को जीतने जा रही है? क्या भाजपा ने ममता के गढ़ में सेंध लगा दी है? क्या 4 मई को बंगाल में ममता का किला ढह जाएगा? इन सवालों को लेकर 'वेबदुनिया' ने बंगाल की पूरी चुनावी राजनीति को करीब से देखने वाले राजनीतिक विश्लेषकों और पत्रकारों से चर्चा की।
 
राजनीतिक विश्लेषक बताते है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। राज्य में बदलाव की बयार महसूस की जा रही है। बंगाल का इस बार का चुनाव पिछले कई चुनाव से एकदम अलग ढंग से लड़ा गया और अब परिणाम भी काफी चौंकाने वाले होंगे। राज्य में 93 प्रतिशत से अधिक हुआ मतदान का सीधा फायदा भाजपा को मिलता हुआ दिखाई दे रहा है और यह तय है कि चुनाव में  भाजपा का वोट परसेंट पिछले चुनाव के मुकाबले निश्चित तौर पर बढा है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि यह वोट परसेंट इतना बढ़ा है कि वह भाजपा को सत्ता तक पहुंचा दें। 
 
बंगाल में चुनाव के दौरान सबसे प्रमुख पहलू मतदाताओं का ध्रुवीकरण रहा है। अलग-अलग समुदायों के बीच स्पष्ट राजनीतिक झुकाव देखने को मिला। वोटिंग के दौरान वोटरों का ध्रुवीकरण भी साफ नजर आय़ा। भाजपा यह समझने में सफल रही कि ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तुष्टिकरण की राजनीति की पोषक है और टीएमसी मुस्लिमानों की पार्टी बन गई है, यहीं कारण है कि चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटरों का ध्रुवीकरण देखा गया। विपक्षी दल भाजपा राज्य में  इस धारणा को मजबूत करने की कोशिश की कि राज्य की मौजूदा राजनीति एक खास वर्ग की ओर झुकी हुई है, और इसी आधार पर उसने अपने पक्ष में समर्थन जुटाने की रणनीति बनाई।
 
इन विधानसभा चुनाव में बंगाल में भाजपा को लोगों ने एक विकल्प के तौर पर देखा। जिस तरह 2011 वामपंथी शासन को हटाकर ममता सत्ता में आई थी, उसी तरह इस बार विधानसभा चुनावों में लोगों के सामने भाजपा एक विकल्प के तौर पर नजर आई। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मतदाताों ने इस बार विकल्प की जाना पंसद किया है, इससे बंगाल में बदलाव की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
 
विकल्प तलाशने के एक नहीं कई कारण थे। भ्रष्टाचार का मुद्दा भी इस चुनाव में प्रमुखता से उठाया गया। भाजपा ने लगातार आरोप लगाए कि राज्य में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है और इसी मुद्दे को लेकर जनता के बीच अपनी बात रखने की कोशिश की। पिछले डेढ़ दशक से सत्ता में काबिज ममता बनर्जी के आसपास चुनिंदा लोगों के समूहों का होना और जमीनी कार्यकर्ताओं से उनकी दूरी चुनाव में टीएमसी पर भारी पड़ सकती है। ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को लेकर भी पार्टी कार्यकर्ताओं में वह निष्ठा नही है, जो ममता के प्रति थी। 
 
वहीं राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि मतदान के दिन एक और दिलचस्प पहलू सामने आया, मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी यानि 93 प्रतिशत से अधिक मतदान होना। भाजपा ने अपने वोटरों को मतदान केंद्र तक लाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी,  जिसका असर वोटिंग प्रतिशत में देखने को मिला। वहीं SIR के बाद लोगों के मन यह डर भी दिखाई दिया कि अगर वह मतदान नहीं करेंगे तो भविष्य में उनके वोट खत्म हो जाएगा, जिससे प्रवासी बंगाली इस बार चुनाव में वोट डालने के लिए बंगाल बड़ी संख्या में लौटे। 
 
वोट प्रतिशत के आंकड़ों पर नजर डालें तो विपक्षी दल का समर्थन पिछले चुनावों की तुलना में बढ़ता हुआ दिख रहा है। हालांकि, यह बढ़त जीत में कितनी तब्दील होगी, यह परिणाम आने के बाद ही साफ हो पाएगा। कई सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी बताया जा रहा है, जहां जीत-हार का अंतर महज 5 से 10 हजार वोटों के बीच रह सकता है।
 
हलांकि राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते है कि सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी और उसकी मुखिया ममता बनर्जी की योजनाओं खासकर महिलाओं को लेकर चलाई जा रही योजनाओं का असर अब भी काफी है। इन योजनाओं का असर जमीनी स्तर पर दिखाई भी देता है, जिससे मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं रह गया है। टीएमसी ने खुद को धर्मनिरपेक्ष छवि के साथ पेश करते हुए बंगाली अस्मिता को चुनावी मुद्दा बनाया। यह रणनीति भी मतदाताओं के एक वर्ग को प्रभावित करती नजर आई है और इसका असर चुनाव परिणाम में भी देखा जाएगा। 
 

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