Hanuman Chalisa

ट्रंप के घुड़की-धमकी वाले स्वर दावोस में अचानक बदले

राम यादव
US President Donald Trump: स्विट्ज़रलैंड के दावोस शहर में हर वर्ष होने वाले विश्व आर्थिक फ़ोरम में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपनी अब तक की घुड़की-धमकी के स्वर अचानक बदल दिए। उन्होंने ने ग्रीनलैंड विवाद का समाधान मिल जाने की घोषणा कर दी है। इसके चलते यूरोपीय संघ के देशों पर लगाए जाने वाले टैरिफ (सीमाशुल्क) फिलहाल रद्द कर दिए गए हैं।
 
ट्रंप के अनुसार, ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर एक समझौते की रूपरेखा तैयार हो गई है। इसलिए, यूरोपीय संघ के देशों पर 1 फरवरी से लगने वाले अमेरिकी टैरिफ अब नहीं लगाए जाएंगे। ट्रंप ने बुधवार, 21 जनवरी को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर यह जानकारी दी। ट्रंप का कहना है कि दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर नाटो के महासचिव मार्क रुटे के साथ उनकी 'बहुत ही सार्थक बैठक' हुई। इस बैठक में उन्होंने ग्रीनलैंड और पूरे आर्कटिक क्षेत्र पर एक समझौते की रूपरेखा तैयार की। ट्रंप ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस समझौते में वास्तव में क्या कुछ शामिल है, लेकिन उन्होंने कहा कि जो समाधान निकला है, वह 'संयुक्त राज्य अमेरिका और सभी नाटो देशों के लिए बहुत अच्छा है।'
 
नाटो के महासचिव ने रची रणनीति : 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने तीन उच्च पदस्थ अधिकारियों के हवाले से बताया कि अमेरिका को ग्रीनलैंड में कुछ छोटे-छोटे भूखंडों पर संप्रभुता मिल सकती है। अमेरिका वहां अतिरिक्त सैन्य अड्डे भी स्थापित कर सकता है। बताया जाता है कि मार्क रुटे कुछ समय से इस रणनीति पर सोच-विचार कर रहे थे। इस जानकारी के सूत्रों के लिए यह स्पष्ट नहीं था कि यह विकल्प ट्रंप द्वारा घोषित 'फ्रेमवर्क समझौते' का हिस्सा था या नहीं। जर्मन दैनिक 'फ्रांकफुर्टर अल्गेमाइने त्साइटुंग' का नाटो के सूत्रों के हवाले से कहना है कि मार्क रुटे, दावोस में ट्रंप के साथ अपनी बैठक में एक प्रस्ताव लेकर आए थे, जिसमें अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डों का अधिग्रहण शामिल था।
 
यह योजना साइप्रस में ब्रिटेन के दो सैन्य अड्डों वाले उदाहरण पर आधारित थी। ब्रिटिश सरकार वहां दो हवाई अड्डे संचालित करती है। उनका उपयोग केवल सैन्य उद्देश्यों के लिए किया जाता है, आर्थिक उद्देश्यों के लिए नहीं। अमेरिका ग्रीनलैंड में केवल एक हवाई अड्डा संचालित करता है। 2004 के एक समझौते के अधीन ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के विस्तार की भी अनुमति है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों ने पहले ही संकेत दे दिया था कि वे आम तौर पर ऐसे किसी विस्तार के पक्ष में ही हैं, विरोध में नहीं।
 
समझौते का विवरण बाद में : डॉनल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड की गुत्थी के आकस्मिक समाधान का कोई विवरण नहीं दिया है। अमेरिकी टेलीविजन 'सीएनबीसी' के साथ एक साक्षात्कार में, ट्रम्प ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह एक दीर्घकालिक समझौता है, 'हमेशा के लिए है।' कुछ हद तक जटिल इस समझौते का विवरण बाद में जारी किया जाएगा। इसमें सुरक्षा पहलुओं के अलावा ग्रीनलैंड के खनिज संसाधनों को भी शामिल किया जाएगा। आगे की बातचीत फिलहाल जारी है। उपराष्ट्रपति जेडी वैंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ –– जो आमतौर पर रूस के साथ संबंधों के प्रभारी हैं –– इन वार्ताओं का नेतृत्व कर रहे हैं।
 
नाटो के महासचिव मार्क रुटे ने ट्रंप के बयान की पुष्टि की और उसे “बहुत अच्छा नतीजा” बताया। उन्होंने 'फॉक्स न्यूज़' टेलीविजन पर कहा कि वे आर्कटिक (उत्तरी ध्रुव) क्षेत्र की संयुक्त सुरक्षा की आवश्यकता से सहमत हैं। रूस और चीन की ग्रीनलैंड की अर्थव्यवस्था तक पहुंच को रोकने के संबंध में ग्रीनलैंड और डेनमार्क के साथ अमेरिका अपनी बातचीत जारी रखेगा, “अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।”
 
टैरिफ छूट से राहत मिली : डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसन ने अमेरिकी राष्ट्रपति की घोषणा पर राहत व्यक्त की। उनकी टिप्पणी थी, यदि इस घोषणा का मतलब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' के बजाय सामान्य संचार माध्यमों पर लौटना है, तो यह सकारात्मक बात है। यह भी महत्वपूर्ण है कि ग्रीनलैंड के लोगों का सम्मान करने वाला कोई समाधान निकाला जाए। डेनमार्क अमेरिका की चिंताओं का भी समाधान करना चाहता है।
 
स्वीडन की विदेश मंत्री मारिया स्तेनरगार्द को यह बात अच्छी लगी कि ट्रंप, डेनमार्क और ग्रीनलैंड का समर्थन करने वाले यूरोपीय देशों पर दंडात्मक टैरिफ लगाने से अब परहेज़ करेंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि डेनमार्क के समर्थकों का आपसी सहयोग प्रभावी रहा है। जर्मनी के उप-चांसलर और वित्त मंत्री लार्स क्लिंगबाइल का कहना है कि पिछले कुछ दिनों के 'उतार-चढ़ाव' के बाद, हमें पहले यह देखना होगा कि ट्रंप और नाटो के महासचिव के बीच क्या ठोस समझौते हुए हैं, 'यह अच्छी बात है कि वे बातचीत में लगे हुए हैं, लेकिन हमें थोड़ा इंतजार करना होगा।' क्लिंगबाइल किसी ट्वीट पर भरोसा करने के बदले समझौते को लिखित रूप में देखना चाहते हैं।
 
तीन बिंदुओं पर बातचीत : कहने को तो बड़बोले ट्रंप 'हमेशा के लिए' एक समझौता करना चाहते हैं। किंतु, उनकी बातों पर विश्वास करना कठिन होता है। अतः समझा जाता है कि अब तीन बिंदुओं पर बातचीत होनी है: पहला, ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती के संबंध में डेनमार्क और अमेरिका के बीच 1951 में हुए समझौते पर पुनर्विचार किया जाएगा। बातचीत में ट्रंप की 'गोल्डन डोम' परियोजना भी शामिल होगी, जो अंतरिक्ष में मिसाइलों का पता लगाने और उन्हें रोकने के लिए उपग्रहों का उपयोग करने वाली एक रक्षा प्रणाली है। अमेरिका उसे ग्रीनलैंड में ही स्थापित करना चाहता है।
 
दूसरा, यूरोपीय संघ को आर्कटिक क्षेत्र में अधिक प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए –– जिसका संभावित अर्थ इस क्षेत्र में जर्मन सैनिकों की अच्छी संख्या में उपस्थिति भी हो सकता है। और तीसरा, अमेरिकी सरकार ग्रीनलैंड में विदेशी निवेशों पर सह-नियंत्रण पाना चाहती है, ताकि चीन और रूस को इस द्वीप देश से दूर रखा जा सके। समझा जाता है कि ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुश्नर, वहां के उपराष्ट्रपति जेडी वैंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ मिलकर अमेरिकी सरकार की ओर से वार्ताओं का नेतृत्व करेंगे।
 
नए टैरिफ नहीं लगेंगे : भावी समझौते के बदले में, अमेरिका अपने यूरोपीय साझेदारों पर नए टैरिफ नहीं लगाएगा। ट्रंप के पिछले क्षेत्रीय दावे का क्या होगा? 'फॉक्स न्यूज' टेलीविजन से बात करते हुए नाटो के महासचिव मार्क रुटे ने कहा कि टैरिफ अब कोई मुद्दा ही नहीं रह गए हैं। इस सारे घटनक्रम के प्रेक्षकों का कहना है कि ट्रंप डींग हांकने में ही नहीं, अचानक पीछे हट जाने में भी पटु हैं। इसीलिए, दावोस में अपने कड़वे भाषण के कुछ ही घंटों के भीतर वे पीछे हट गए। चीजें जब अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए बहुत जोखिम भरी हो जाती हैं, तो वे अचानक पलटी मार जाते हैं। अप्रैल, 2025 में उनकी बेतुकी टैरिफ घोषणा से शेयर बाजार में आए तेज उतार-चढ़ाव के समय भी ऐसा ही हुआ था।
 
इस बार दावोस में, 21 जनवरी की रात आचानक पीछे हटने से चार ही दिन पहले, शनिवार 17 जनवरी को ट्रंप ने जर्मनी, डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, नीदरलैंड, फिनलैंड और ब्रिटेन के विरुद्ध 1 फरवरी से 15 प्रतिशत और 1 जून से 25 प्रतिशत के नए टैरिफ लगाने की धमकी दी थी–– यदि तब तक ग्रीनलैंड अमेरिका के 'पूर्ण' नियंत्रण में नहीं आ गया। इससे पहले उन्होंने सैन्य अभियान चलाने और विजय पाने की भी धमकी दे रखी थी। अब ये सारी धमकियां गीदड़ भभकियां बन कर रह गई हैं।
 
बचकाने किस्म की तस्वीरें : सोमवार, 19 जनवरी की रात ट्रंप ने अपने प्लेटफॉर्म ट्रुथसोशल पर कृत्रिम बुद्धमत्ता AI की सहायता से बनी बचकाने किस्म की तस्वीरें पोस्ट की थीं, जिनमें खुद उन्हें, उपराष्ट्रपति जेडी वैंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो को ग्रीनलैंड की धरती पर अमेरिकी झंडा लगाते हुए दिखाया गया है; बगल में एक बोर्ड है जो ग्रीनलैंड को अमेरिकी संपत्ति घोषित करता है। इस बचकानेपन के दूसरे ही दिन, मंगलवार को शेयर बाजार में उथल-पुथल मच गई। तर्क दिया गया कि अपनी बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति के बावजूद, अमेरिका की 'एक प्रमुख कमजोरी' यह है कि वह अपने भारी बाहरी घाटे के भुगतान के लिए दूसरों पर निर्भर है। यूरोप अमेरिका का सबसे बड़ा ऋणदाता है; यूरोपीय देशों के पास आठ खरब (8 ट्रिलियन) डॉलर मूल्य के अमेरिकी बॉन्ड और स्टॉक हैं –– जो शेष विश्व के कुल बॉन्ड और स्टॉक से लगभग दोगुने हैं। अमेरिकी सरकारों को बॉन्ड बाजारों में बढ़ती ब्याज दरों से ज्यादा किसी और चीज़ का डर नहीं सताता।
 
यही नहीं, अमेरिका के अधिकांश नागरिकों (75 प्रतिशत) ने ग्रीनलैंड के अमेरिका में विलय के विचार को मत संग्रहों में ठुकरा दिया। हाल के दिनों में, व्हाइट हाउस में इस बात पर चर्चा होने की खबरें आई हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप अपनी अतिवादी मांगों से पीछे हटते हुए अपनी प्रतिष्ठा कैसे बचा सकते हैं। इसके लिए दावोस एक आदर्श मंच था –– दुनिया के सामने एक और साहसिक कदम, तत्काल बातचीत की मांग और फिर कुछ ही मिनटों में पर्दे की आड़ लेकर पीछे हट जाना। यह सब जितनी आसानी से हो पाया, उसका श्रेय अतीत में नीदरलैंड के लोकप्रिय प्रधानमंत्री रहे और अब नाटो के महासचिव मार्क रुटे को भी जाता है। उन्हें 'ट्रंप का सलाहकार' माना जाता है; कहा जाता है कि उन्होंने हाल के दिनों में जर्मन सरकार और यूरोपीय संघ के अन्य साझेदारों के साथ मिलकर काफी काम किया है।
 
सम्मेलन का पहला दिन : ट्रंप दावोस सम्मेलन के दूसरे दिन वहां पहुंचे थे। सम्मेलन के पहले दिन, सब की निगाहें फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष जर्मनी की उर्सुला फ़ॉन देयर लाएन पर टिकी थीं। माक्रों ने अपनी मांग दोहराई: यूरोपीय संघ को आर्थिक दबाव के खिलाफ अपने उस कानून का –– जिसे व्यापार बाज़ूका कहा जाता है –– पहली बार उपयोग करने में संकोच नहीं करना चाहिए। अपने भाषण में फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने ट्रंप पर 'साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं' का आरोप लगाया। ट्रंप की ओर से 'नए शुल्कों की अंतहीन श्रृंखला' थोपे जाने पर खेद व्यक्त किया और इन शुल्कों को 'मौलिक रूप से अस्वीकार्य' बताया, 'खासकर तब, जब उनका उपयोग क्षेत्रीय संप्रभुता के खिलाफ दबाव बनाने के लिए किया जाता है'।
 
माक्रों ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों के वैश्विक परित्याग और साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की वापसी से बचने की चेतावनी दीः हम 'नियमों-क़ानूनों से रहित एक ऐसी दुनिया की ओर बदलाव' का अनुभव कर रहे हैं, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कानून को रौंदा जा रहा है; जिसमें केवल सबसे शक्तिशाली का मनमाना कानून ही मायने रखता है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने कहा कि 'दुनिया में बढ़ते क्रूर व्यवहार को देखते हुए, फ्रांस और यूरोप को प्रभावी बहुपक्षवाद का बचाव करना चाहिए, क्योंकि यह हमारे और उन सभी के हित मे है, जो शक्ति प्रदर्शन के आगे झुकने से इनकार करते हैं।' अमेरिका से मिल रही निर्मम प्रतिस्पर्धा का उद्देश्य 'यूरोप को कमज़ोर बनाना और अपने अधीनस्थ करना' है। ट्रंप की योजनाओं के कारण नाटो एक 'कमजोर संस्था' बन गया है।
 
यूरोप-अमेरिकी संबंधों में गिरावट : फ्रांसीसी राष्ट्रपति के भाषण से पहले, यूरोपीय संघ के आयोग की अध्यक्ष जर्मनी की उर्सुला फ़ॉन देयर लाएन ने अपने संबोधन में अमेरिकी धमकियों को एक गलती बताया –– 'विशेषकर सहयोगियों के बीच' –– और ट्रंप को चेतावनी दी कि वे यूरोप-अमेरिकी 'ट्रांसअटलांटिक संबंधों' को गिरावट की ओर न धकेलें। यूरोपीय संघ के संभावित जवाबी उपायों के संबंध में अपने भाषण में उन्होंने कहा, 'हमारा जवाब निडर, एकजुट और उचित होगा।' यह स्पष्ट नहीं किया कि वे कथित 'व्यापारिक बाज़ूका' का उपयोग करने पर विचार कर रही हैं या नहीं। 
 
स्मरणीय है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इन दिनों रट लगा रखी थी कि वे डेनमार्क के स्वामित्व वाले ग्रीनलैंड द्वीप को हर तरीके से हथियाना चाहते हैं। वे इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा हितों का हवाला देते हैं, जबकि 1951 में डेनमार्क के साथ हुई 'थुले संधि' के अनुसार, अमेरिका के पास वहां अपनी सैन्य उपस्थिति आवश्यकतानुसार बढ़ाने का पूरा अधिकार है। पर ट्रंप, येनकेन-प्रकारेण पूरे ग्रीनलैंड को हथियाने पर उतारू हैं। यही नहीं, ट्रंप ने जर्मनी सहित ऐसे आठ यूरोपीय देशों पर नए टैरिफ थोपने की घोषणा करदी, जो ग्रीनलैंड और डेनमार्क का समर्थन कर रहे हैं।
 
मनमाने दावे : ट्रम्प के इस दावे का जिक्र करते हुए कि डेनमार्क, रूस और चीन से ग्रीनलैंड की पर्याप्त रक्षा नहीं कर सकता, यूरोपीय संघ के आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फ़ॉन देयर लाएन ने कहा कि डेनमार्क, अमेरिका और सभी अन्य साझेदारों के साथ मिलकर आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा के लिए एक व्यापक अवधारणा पर काम करेगा। वर्तमान तनाव उन दुश्मनों को फायदा पहुंचा रहा है, जिन्हें डेनमार्क अपने रणनीतिक हित वाले क्षेत्रों से दूर रखना चाहता है।
 
दावोस सम्मेलन शुरू होने से पहले, ट्रंप ने वहां ग्रीनलैंड के प्रश्न पर वार्ता करने की अपनी मंशा जताई थी। उन्होंने फ्रांसीसी राष्ट्रपति का एक निजी संदेश भी प्रकाशित किया, जिसमें माक्रों ने पेरिस में G7 गुट के सदस्यों के साथ एक बैठक का प्रस्ताव रखा था। फ्रांसीसी राष्ट्रपति के इस संदेश में कहा गया था कि डेनमार्क और रूस को भी वार्ता में शामिल किया जाना चाहिए। अपने भाषण के बाद, माक्रों ने पत्रकारों से कहा कि दावोस के विश्व आर्थिक मंच पर ट्रंप से बात करने की उनकी कोई योजना नहीं है। उल्लेखनीय है कि कुछ ही समय पूर्व वॉशिंगटन में ट्रंप और माक्रों के बीच अच्छी ख़ासी नोक-झोंक हो चुकी है। दोनों एक-दूसरे को पसंद नहीं करते। मुंहफट ट्रंप को कोई पसंद कर भी कैसे सकता है!

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

जरूर पढ़ें

लाखों भारतीय ट्रंप के H-1B visa बम से सीधे प्रभावित होंगे

बिहार : क्या फिर महिलाओं के भरोसे हैं नीतीश कुमार

भारत को रूस से दूर करने के लिए यूरोपीय संघ की नई रणनीति

इसराइल पर यूरोपीय संघ के प्रतिबंध का जर्मनी समर्थन करेगा?

भारतीय छात्रों को शेंगेन वीजा मिलने में क्या मुश्किलें हैं

सभी देखें

समाचार

उत्‍तर प्रदेश ने बनाया नया रिकॉर्ड, 26 हजार से अधिक गांवों में पहुंचा 'हर घर जल'

उत्तर प्रदेश की ताकत बनेगा ओडीओसी : CM योगी

योगी सरकार की 'फॉर्च्यून 500 नीति' से बदलेगा यूपी का भविष्य, कई वैश्विक कंपनियां बना रहीं प्रदेश को अपना ठिकाना

अगला लेख