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काव्य-संसार
बाबा, मत ब्याहना उस देश में
बेटी पर कविता
मां, मैं अब तुम्हारे सी दिखने लगी हूं
फूल पत्थर पर खिलाकर देखिए
फूल पत्थर पर खिलाकर देखिए बूंद् में सागर छिपाकर देखिए कितना आसां है जहां को कोसना खुद से खुद को ही ल...
अब तो तोड़ो मौन
अक्षर के निवास पर गोली बारूद क्यों अधूरा रह जाता है हमारा वजूद? क्या गोली बारूद में अक्षर नहीं होते?...
उसकी याद आती है
एक अरसा बीत गया अब वह नहीं आती उसकी याद आती है तब वह आती थी खूबसूरत, नन्हें खरगोश की तरह हड़बड़ाती ह...
भारत मां का दुलारा मध्यप्रदेश
1 नवंबर 1956 की खास खबर, आजाद भारत मां के गर्भ से, सवा नौ वर्ष बाद जन्मा यह प्रदेश, भारत मां का दुला...
चंद्रसेन विराट के दोहे
इतनी ही थी हैसियत, नहीं भक्ति में फेर। सबके हाथों में है कमल, मेरे हाथ कनेर।। लोक ग्रहण कर ले अगर, स...
सोचा न था...
वक्त धोखा इस तरह दे जाएगा सोचा न था, आदमी इस हद तलक गिर जाएगा सोचा न था। स्वर्ग धरती पर उठा लाने की ...
शुभ-दीप-कामना
दीप एक जलता रहे
जब तुमने पुकारा था मुझे...
तुम्हारे लबों पर जब आया मेरा नाम बेइंतहा खूबसूरत हो गया, फिर जब तुमने पुकारा मुझे तो मुझे खुद से प्य...
दिनकर की 'शरद' पर कविता
औ शरत अभी क्या गम है तू ही वसंत से क्या कम है है बिछी दूर तक दूब हरी हरियाली ओढ़े लता खड़ी कासों के ...
रामधारी सिंह दिनकर की 'चाँद' पर कविता
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, और फिर...
रामधारी सिंह दिनकर की कविता
आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहां जुगाएगा? मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच तो न खा जाएगा? आजादी रोटी...
लता, तुम हो तो रंग लौटते हैं
लता, तुम्हारे झिंझोड़ने से उठती है हर हिन्दुस्तानी सुबह तुम्हारी थपकी से पांव पसारती है टूटती हुई दुप...
कबीर के दोहे
माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥ माला फेरत जुग गया, गया न म...
स्त्री : रसोई और बिस्तर से परे
क्या तुम जानते हो पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत? घर प्रेम और जाति से अलग एक स्त्री को उसकी अपनी ...
स्मृति
सिर्फ एक बार नहीं बार-बार आऊंगी तुम्हारे पास आते हैं जैसे दिन-रात कभी-कभी नहीं अक्सर मिल जाया करूंगी...
महामहिम पधारे हैं
खून से रंगे हाथों पर चढ़ाकर सफद दस्ताने शातिर चेहरे की कुटिलता पर ओढ़कर मधुर मुस्कानें दुनिया के हर ...
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