मेरी दादी की आंखों में डिबरी का सूरमा था जो डिबिया की लौ के साथ रातभर दुआर पर जागता था। उन आंखों में मुझे लहलहाते खेत कल-कल करती नदी अलसाया हुआ भोर और रंभाती गाएं सब दिख जाती थीं। मैं और भी बहुत कुछ देखता था मेरे वंश...