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मप्र में भाजपा फिर आएगी?

अनिल शर्मा
2018 में मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव होने हैं। सितंबर 2018 में होने वाले चुनाव के परिणामों के काल्पनिक आकलन टीवी आदि पर शुरू हो जाएंगे और सांख्यिकीय आंकड़ों की स्थिति लहरों की मानिंद रहेगी। फिर भी इस बात में कोई मतभेद नहीं कि इस बार भी अपने मैनेजमेंट, सेवाभाव और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान द्वारा जनता के साथ जोड़े गए 'मामा' के रिश्ते और जज्बातों आदि की वजह से भाजपा 2018 का विधानसभा चुनाव पिछले चुनावों की बनिस्बत 20 प्रतिशत ज्यादा सीटों से जीत जाए। चूंकि मप्र भाजपा का गढ़ बन गया है, दूसरा यह कि कांग्रेस की छवि को पुन: धरातल पर ला सके मप्र में कोई ऐसा नेता नजर ही नहीं आता।
 
जाहिर-सी बात है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि केंद्र से चला रुपया जनता तक पहुंचते-पहुंचते 15 पैसे बचता है, लेकिन वर्तमान में भाजपा शासन में केंद्र से चला रुपया जनता तक पहुंचते-पहुंचते 25 पैसे हो गया है। यानी जनता को भाजपा द्वारा कराए जा रहे काम भी नजर आ रहे हैं, जबकि कांग्रेस अगर अपने लंबे कार्यकाल में ऐसे ही कुछ काम करा देती तो कांग्रेस का इतिहास आज कुछ और होता।
 
जनता को वर्तमान में भाजपा द्वारा कराए गए और कराए जा रहे काम दिख रहे हैं। जनता कहती है कि भ्रष्टाचार भाजपा में भी है, मगर काम भी तो करा रही है। हालांकि 2018 के नगरीय निकाय चुनाव में मप्र में कांग्रेस ने अनेक स्थानों पर जीत हासिल की है, परंतु इसका ये मतलब नहीं कि विधानसभा या लोकसभा 2019 में भी कांग्रेस आगे रहेगी या सत्ता हासिल करेगी। मप्र में जनता (तकरीबन 87 प्रतिशत आबादी) कांग्रेस को इतिहास बना चुकी है और इसमें कांग्रेस की गुटबाजी ने अहम काम किया है।
 
भाजपा का मैनेजमेंट मिशन
 
क्रिश्चियन मिशनरी की सेवाभावना की माफिक ही एकबारगी भाजपा का मैनेजमेंट नजर आता है यानी छोटे से छोटे आदमी को गले लगाना। भले ही यह वोटों के कारण हो, मगर जनता के जज्बात के आगे यह सब गौण हो जाता है कि भाजपा वोटों की खातिर गरीबों को गले लगा रही है। उनकी लाड़लियों को शिक्षा दिला रही है। इसके अलावा मप्र के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने अपनी छवि बतौर मुख्यमंत्री की बनिस्बत एक जनसेवक से ज्यादा जनता के रिश्तेदार यानी 'मामा' के रूप में बनाई है।
 
जरा-सा झटका था
 
नगरीय निकाय चुनाव के दौरान भले ही भाजपा को हल्का-सा झटका लगा हो, लेकिन परिस्थितियां और अतीत बताता है कि भाजपा के सामने जब भी ऐसी स्थिति आती है, फाइनल तक पहुंचते-पहुंचते उसमें और भी समझदारी आ जाती है और अपने मुगालते दूर कर लेती है। आगामी विधानसभा चुनाव में नगरीय निकाय में भले ही भाजपा को झटका लगा हो, लेकिन मप्र के विधानसभा चुनाव में ऐसा असंभव नहीं, तो नामुमिकन जरूर है।
 
कांग्रेस के अलावा कोई विकल्प नहीं
 
मप्र विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ही प्रमुख दल होंगे, क्योंकि आप-शाप, बसपा-फसपा का नजारा मप्र में शायद ही एक-दो स्थानों पर हो।
 
मोदी के भक्त बने शिवराजसिंह चौहान
 
शिवराजसिंह चौहान को आडवाणी कैंप का माना जाता रहा है लेकिन मोदी का जलवा देखने के बाद शिवराज ने भी पाला बदल लिया और मोदी के रंग में खुद को पूरी तरह से रंग लिया। जाहिर-सी बात है कि मप्र में विकास कार्यों के लिए मोदी ने कभी आनाकानी नहीं दिखाई।
 
गुटों में बंटी हुई है कांग्रेस
 
वैसे कांग्रेस नहीं मानती कि मोदी ने मध्यप्रदेश के भले के लिए कुछ किया है। कांग्रेस के नेता कहते हैं कि यहां सिर्फ पब्लिसिटी की राजनीति हो रही है। कांग्रेस भले ही मोदी या शिवराजसिंह को कोस रही है लेकिन धरातल पर कांग्रेस की स्थिति ठीक नहीं है। कांग्रेस यहां कई गुटों में बंटी हुई है। जानकार कहते हैं कि जो हाल है उसे देखकर लगता नहीं कि कांग्रेस यहां आगे मोदी या शिवराजसिंह को चुनौती देने की हालत में है। यह भी कह सकते हैं कि मप्र विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस से वही उम्मीदवार खड़े होंगे जिन्हें मालूम है कि वे हार जाएंगे।
 
जो नाराज हैं...
 
ये बात नहीं है कि मप्र की भाजपा सरकार से पूरे राज्य की जनता खुश है, कुछ लोग नाखुश भी हैं, लेकिन इन नाखुश लोगों का इरादा भी या कहा जाए कि पांसा भी चुनाव की टेम भाजपा की तरफ हो जाएगा। वो भी भाजपा के मिशनरी यानी सेवाभावी कामों से। परिस्थितियों के मद्देनजर ये केवल मेरे विचार हैं।
 
जनता की नाराजी का सबसे बड़ा कारण है विकास के नाम पर कई जगहों पर बरसों पुराने आशियाने ध्वस्त कर दिए गए, गायों को जंगलों में लावारिस छोड़ दिया गया (जैसा कि जनचर्चा में आमफहम है), पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए, वगैरह-वगैरह। फिर भी मप्र की जज्बाती जनता के दिलोदिमाग में जिस प्रकार अतीत में कांग्रेस बसी थी, वही स्थान आज भाजपा ने ले लिया है।

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