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टूटते समाज, बिखरती परंपराएं, सिसकते रीति-रिवाज...

डॉ. छाया मंगल मिश्र
'जब समाज टूट रहा होगा तब लोग उसे बचाने नहीं, अपना हिस्सा लेने आएंगे'। रघुवीर सहायजी का कहा कितना  सत्य हो रहा है, ये हम सभी जानते हैं। हम भी तो समाज से अपना हिस्सा मांग रहे हैं न? विवाह उसे कहते हैं,  जो वेदी पर मंडप के नीचे पंडितजी मंत्रोच्चारण के साथ देवताओं और पूर्वजों का आह्वान करके वैदिक रस्मों के  साथ संपूर्ण हो।
 
केवल नाचने-गाने, दारू पीकर हुल्लड़ मचाने, रिश्तेदारों और दोस्तों को इकट्ठा करके डीजे बजाने, नाचते हुए लोगों  पर पैसा लुटाने, घर में 7-8 दिन धूम मची रहे, क्या उसको विवाह कहते हैं? पार्टियां खाई हैं तो खिलानी भी  पड़ेंगी ठीक है। समय के साथ रीति-रिवाज बदल गए हैं मगर दिखावे, अश्लीलता, आडंबर और बाजारू प्रवृत्ति से  बचें। घंटों बेहूदा नाचने में लगा देंगे, मेहमानों से मिलने में लगा देंगे, जयमाला में लगा देंगे, फोटो खींचने में  लगा देंगे और मुख्य कर्म के समय आनाकानी करते नजर आएंगे।
 
विवाह का कोई एक मुहूर्त का दिन निश्चित करके उस दिन सिर्फ और सिर्फ विवाह से संबंधित रीति-रिवाज होने  चाहिए जिसमें गुरुजन, घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद मिले। पर होता ये है कि कार्यक्रम स्थल रोमांटिक प्री  वेडिंग फोटो शूट के होर्डिंग से पटा पड़ा है, वर-वधू सहित उसके परिजन भी अजीबोगरीब परिधान में हैं, उलजलूल  अश्लील गाने बज रहे हैं, नाच रहे हैं, वरमाला के वक्त वर-वधू को ऊंचा-ऊंचा उठाया जाकर बेहूदगियां हो रहीं, नए  दिखावे चल पड़े जिनके कई हादसे/ दुर्घटनाओं के वीडियो हम आए दिन देख रहे हैं, जानमाल सभी का खतरनाक  नुकसान उठाना पड़ता है।

हमें सख्ती से कह देना चाहिए कि कैमरामैन फेरों आदि के चित्र दूर से लें, बार-बार रोक-टोक न करें। ये देवताओं  का आह्वान करके किया जा रहा और ये विवाह समारोह है, किसी घटिया फिल्म की शूटिंग नहीं। वर-वधू द्वारा  कैमरामैन के कहने पर उल्टे-सीधे पोज से इंकार कर दें। 
 
समय प्रबंधन इतना गड़बड़ाया होता है कि शामिल होने  वाले लोग परेशान हो जाते हैं। बदइंतजामी शुरू हो जाती है। कई लोग तो दूल्हा-दुल्हन की शक्ल तक नहीं देखते,  उनका नाम तक नहीं जानते। बारात आई, नहीं आई से कोई मतलब नहीं।
लगभग हर विवाह में हम अनावश्यक लोगों को आमंत्रण देते हैं जिन्हें कि आपके वहां हो रहे विवाह में कोई रुचि  नहीं होती। वे केवल दावत में आए होते हैं। वे आपका केवल नाम जानते हैं। आपके घर की लोकेशन जानते हैं।  आपकी पद-प्रतिष्ठा जानते हैं और जो केवल स्वादिष्ट और विविधतापूर्ण व्यंजनों का स्वाद लेने आते हैं। आपकी  कमियां निकालने, खामियां ढूंढने, आपका मजाक उड़ाने और हर आने-जाने वाले की निंदा करने या कलेश मचाने  वाले होते हैं ये अनावश्यक लोग। टीका-टिप्पणी में निपुण, बात-बात में जहर उगलने वाले लोग।
 
 
पहले शादियों में रिश्तेदार काम करने में जरा भी झिझकते न थे, अब तो आए को 'आओ' कहने में भी जोर आता  है, उठके इंतजाम देखना तो बहुत दूर की बात है, टांकोंटांक टाइम पर या देर से आना, केवल मजे लेना, औरतों  का भी मिजाज कोई कम नहीं। पार्लर से आईं इनका पल्लू तक सेट है, मजाल है एक गिलास पानी तो पिला दें  किसी को... जिसके घर कार्यक्रम है वो इंतजाम करे, वरना मुंह फुला के किस्सागोई तो है ही।
 
शादियां केवल पिकनिक/ आनंद/ मजे/ एन्जॉय का माध्यम बन गईं हैं, अपनत्व, लगाव, बिछोह, आगमन कोई  मायने नहीं रखता। होने वाली पूल और डेस्टिनेशन/ रिसॉर्ट शादियों से आम के पत्ते, गेंदे के फूलों और इत्रपान की  खुशबू गायब हो चली है। थीम्स के चलते ढोलक की थाप और गीतों की मिठास भुला दी गई है। नई पीढ़ी के  बच्चों को किसी भी चीज से कोई मतलब नहीं। उन्हें केवल करण जौहर के परदे पर दिखाए को खुद के लिए सच  करना है। वैदिक/ सनातन/ हिन्दू रीति-रिवाज न तो इन्हें मालूम है और न ही वे जानना चाहते हैं।
 
सेल्फी और फोटो कलेक्शन से ही फुरसत नहीं। 
 
ये शादी-विवाह 16 संस्कारों में से एक पावन ऐच्छिक बंधन है कोई किसी मनौती के पूर्ण होने पर बांटा जाने वाला प्रसाद नहीं कि जिसे हर किसी की हथेली पर टिकाया जाए  तो मन हुआ तो खाया, वरना फेंक दिया, कौन देख रहा है?
 
इसी पर टिकी है हमारी सामजिक संरचना, मजबूती, सृजन और आस्थाएं। वंशवृद्धि, कुल परंपरा और रीति-रिवाजों  का फलना-फूलना। अब आपको ही तय करना है कि इस टूटते समाज से आप अपना हिस्सा चाहते हैं या उसे  संपूर्ण सुरक्षित रखना चाहते हैं अपने धर्म-समाज पर गर्व और खुद के आत्मसम्मान के साथ। 
 

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