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आनंद का सनातन प्रवाह

अनिल त्रिवेदी (एडवोकेट)
अध्यात्म की अनुभूति का सनातन प्रवाह हम सबके जीवन के आनन्द में समाया हुआ है। पर जब हम सब, संकीर्ण लोभ लालचवश, सनातन सभ्यता के मूल आध्यात्मिक आनन्द को त्यागकर, वर्तमान में निरन्तर हो रहे यांत्रिक प्रचार तंत्र से अभिभूत हो, विचार व चिंतन-मनन की मूल ऊर्जा को ही लुप्त हो जाने देने के कगार पर खड़े होकर, तेरे-मेरे के मारक व जड़तापूर्ण स्वरूप को ही एकाकी रूप से मान्य कर, एक तरह का यंत्रवत एकांगी जीवन जीने लगते हैं। तो हमारी संकीर्णता और रागद्वेष में लिप्त, सोच, दृष्टि और वृत्ति वाले निजी व सार्वजनिक जीवन के एकांगी दर्शन से न तो हम जीवन के मूल आनन्द को जान पाते हैं और न ही जीवन के सनातन और आध्यात्मिक स्वरूप को अपने जीवन में नित्यप्रति अनुभव कर पाते हैं।
 
हम सबका जीवन मूलत: बंधन मुक्त है। हम इस सनातन सत्य को जानने और समझने के बाद भी इस जगत में अपने जीवन को नित नए बंधनों में निरंतर बांधकर अपना जीवन बिताने के आदी होने के साथ ही कई तरह के बंधनों में आजीवन बंधे रहकर मुक्त, सहज व सनातन जीवन पाकर भी बंधनों को ही जीवन मान लेते हैं। जीवन का मूल स्वरूप शांत, सरल और सहजीवन में व्याप्त है। मानव अपने मूल स्वरूप में जीवन की सनातन सभ्यता का साकार अंश हैं। अंश से ही जीवन और जगत का साकार स्वरूप अभिव्यक्त होता हैं।
 
जीव, जीवन और जगत के सनातन प्रवाह से ही हमें अनंत कालक्रम का ज्ञान मिला। जन्म से मृत्यु तक का समूचा कालखण्ड  जीव के जगत में साकार से निराकार होने का सतत सनातन प्रवाह है। जिसमें हम सब समूचे जीवन के रूप, रंग और प्रवाह को अनुभव करते है। मन, बुद्धि और शरीर के माध्यम से ही जीवन में विचारों और अनुभूतियों की सनातन सभ्यता का उदय होकर जगत के प्रत्येक अंश में सदा के लिए चिंतन मनन और विचार के विभिन्न रूपों की सनातन धारा अनुभव, ज्ञान और अनुभूतियों के रूप में आजीवन मनुष्य जीवन में समाहित होती रहती है।
 
'अहं ब्रम्हास्मि' से लेकर 'तत्वमसि' तक में समूचा सनातन चिन्तन, शून्य से लेकर सनातन साकार स्वरूप में स्वत: या अपने आप चिंतन के सरलतम रूप में जीव, जगत और समूचे जीवन में व्याप्त हैं। जीवन, ऊर्जा का साकार स्वरूप है, जगत, आधार रूप है और जीव, काल की ऊर्जा का साकार अंश है। जो शून्य से अनन्त में इस तरह समाया हुआ है, जिसे कभी कोई अलग नहीं कर सकता। यही सनातन सभ्यता के दर्शन का सरलतम स्वरूप है जो जीव जगत और जीवन के सनातन आनंद का साकार स्वरूप होने से सहज आध्यात्मिक अनुभूति की व्यक्ति और समष्टि में अनंत अभिव्यक्ति का समूचे जगत में निरन्तर प्राकट्य करता है।
 
विचार, प्रकाश और वायु तीनों ऊर्जा की सनातन तरंगें हैं। इन्हें हमेशा के लिए बांधा नहीं जा सकता है। कृत्रिम उपायों से कुछ समय इन्हें रोका जरूर जा सकता है। विचार, वायु और प्रकाश, जगत में जीवन की गति का निर्धारण करने वाली मूल ऊर्जा हैं। प्रकाश होते हुए भी अंधकार में रहना, आकाश वायु का अनंत विस्तार होने पर भी खुली हवा से वंचित रहना। आनंद स्वरूप आध्यात्मिक विचारों का अक्षय विचार सागर छोड़ मनुष्य समूह द्वारा निर्मित विचारधारा को यांत्रिक रूप से पकड़कर, विपरीत विचार या अन्य मत मतांतरों व अन्य विचारों से निरन्तर युद्ध करते रहने को ही जीवन मान लेना। जीवन की जड़ता को प्राणप्रण से मानना और चेतन तत्व को नकारना याने अपने मूल स्वरूप को ही नकारना हैं।
 
विचार भी मूलतः प्रकाश और वायु की तरह मुक्त स्वरूप में ही हैं। हम सब विचारों के मूल स्वरूप और सनातन स्वभाव को छोड़ बनावटी स्वरूप के साथ जकड़ जाते हैं और विचार की ऊर्जा जो जीव, जगत और जीवन को व्यक्तिश: और सामूहिक रूप से जीवन के आनंद के बजाय अनवरत तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति और समाज को धकेल देती है। तब व्यक्ति और समाज का एक अंश अपनी अनोखी वैचारिक ऊर्जा को किसी संगठन की रोगग्रस्त एकांगी विचारधारा को ही अपना जीवन मान लेता है।
 
जीवन के मूल स्वरूप को भुलाकर जड़ कठपुतली की तरह हिलने-डुलने को ही जीवन मान बैठता है। जीवन की सनातन सभ्यता  के मूल दर्शन और स्वरूप को समझना। विचार को चेतना के विराट पुंज की तरह जैसे सूर्य साकार स्वरूप में स्थित है, वैसा मानना, जानना, समझना और स्वीकारना। अग्नि को भी साकार और निराकार सुप्त अवस्था में जीवन की मूल ऊर्जा की तरह ही जानना व मानना।
 
प्रकाश और वायु की तरंगों को कोई व्यक्ति या व्यवस्था रोक देती है तो मनुष्य प्राणप्रण से अंधेरे से उजाले और बंद हवा से खुली हवा में आने का हर संभव उपाय करता है। पर विचारों के साथ ऐसी तत्परता हमें अनुभव नहीं होती। विचारों के बनावटी रूप से बनायी सीमाओं से मुक्त होना हर समय सभी के लिए संभव ही नहीं होता। इसी से बनावटी विचारों से अलग होना या विचारों की यांत्रिक जड़ता को समझकर मुक्ति का मार्ग खोजना, प्रकाश और वायु की रुकावटों से मुक्त होने जैसा सरल नहीं है।
 
हिन्दू दर्शन या सनातन विचार ने विचार के चैतन्य स्वरूप या तारक शक्ति के विराट स्वरूप को समझा और सनातन सभ्यता के रूप में निरंतर विस्तारित किया। जीवन और जीव की जड़ता या मारक शक्ति को स्वीकार नहीं किया। अंधकार है तो प्रकाश की ओर बढ़ो, धूल और धुआं है तो दूर हट जाएं स्थान बदल दें या तात्कालिक उपाय स्वरूप नाक को ढक ले। पर अंधेरे और धूल धुएं से एकाकार न हों अन्यथा जीव और जीवन असमय खतरे में पड़ जाएगा। पर विचार के साथ मनुष्य बड़े बंधन में बंध जाता है।
 
सनातन समय से सनातन विचार हमें बंधन याने वैचारिक बंधन से मुक्त रहने का सरल पथ समझाते आए हैं। पर हम वैचारिक बंधनों से मुक्त न हो, तेरे मेरे की बनावटी यांत्रिक उलझनों में ही उलझे रहते हैं। प्रकाश और वायु की जीवनी शक्ति से मनुष्य ने किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की पर अंधेरे और वायु प्रदूषण से उबरने के विकल्प सोचे। पर विचार की शक्ति से अंतहीन छेड़छाड़ के साथ ही विचार को जकड़बंदी के बनावटी जाल में जकड़ने व यंत्रवत विचार बनाने के प्रयोग मनुष्य के मन में व्यक्तिश: और सामूहिक रूप से चल रहे हैं।
 
अनुशासन और व्यवस्था के नाम पर विचारहीन मनुष्यों का भीड़तंत्र एक नया औजार है। मनुष्य की वैचारिक ऊर्जा को निस्तेज करने का। तन से तो मनुष्य दिखे पर विचारों से यंत्रवत जड़ता वाला रोबोट हो। रोबोटिक समाज की सभ्यता का जीवन दर्शन क्या सनातन सभ्यता के दर्शन के मूल को अपने जीवन में विस्तार दे पाएगा। सनातन सभ्यता जीवन की चैतन्य सभ्यता हैं।
 
विचारहीन और आज्ञानुरागी मनुष्य का वर्तमान और भविष्य जीवन की ऊर्जा के बजाय यंत्र की तरह आज्ञाधारित होगा। तब सनातन विचार का दर्शन जीव, जीवन और जगत की गतिशीलता का केन्द्रबिन्दु किसे मानेगा? विचार मूलत: जगत, जीवन और जीव की प्राण प्रतिष्ठा की तरह है। जैसे प्रकाश के अभाव और वायु के प्रदूषण से जीव और जीवन में रोगग्रस्तता आ जाती है वैसे ही विचार की जड़ता से जीव और जीवन का मूल ही गतिहीन हो अपने सनातन स्वरूप और चेतना को सुप्तावस्था में ले जाता हैं।
 
यह सब होते हुए भी जीव, जीवन और जगत की मूल गति, सनातन सभ्यता के स्वरूप में ही बनी रहती है। काल के चक्र स्वरूप जीव में चेतना और जड़ता की लहरें आती रहती हैं। जैसे लहरें समुद्र नहीं हैं और समुद्र लहरें नहीं हैं। वैसे ही जीव, जीवन और जगत सनातन ऊर्जा का मूल स्वरूप है जो अपने आप में भिन्न भी दिखाई देता हैं और सनातन रूप से अभिन्न भी हैं।

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