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गुरु अंगद देव जयंती, जानें सिख धर्मगुरु के बारे में 10 अनजानी बातें

वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
शनिवार, 18 अप्रैल 2026 (09:09 IST)
Guru Angad Dev life and teachings: सिख धर्म के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी की जयंती यानी प्रकाश पर्व सिख इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पावन अवसर है। उनका जन्म 31 मार्च 1504 को हुआ था, लेकिन नानकशाही कैलेंडर के अनुसार उनकी जयंती वैशाख माह में मनाई जाती है।

भाई लहना जी सिखों के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी का पूर्व नाम था। गुरु अंगद देव जी ने न केवल गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं को आगे बढ़ाया, बल्कि सिख पंथ को एक नई संगठनात्मक शक्ति प्रदान की।ALSO READ: अक्षय तृतीया पर बिना पंचांग देखे करें शुभ काम! जानें पूजा विधि, घर लाएं अटूट संपन्नता

 

आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी 10 अनजानी और महत्वपूर्ण बातें:

 

गुरु अंगद देव जी के बारे में 10 विशेष बातें

 
1. पूर्व नाम 'भाई लहना': गुरु पद पर आसीन होने से पहले उनका नाम 'भाई लहना' था। वे देवी दुर्गा के अनन्य भक्त थे और हर साल ज्वाला जी की यात्रा पर जाते थे। 
 
2. नाम का अर्थ 'अंग': जब गुरु नानक देव जी ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुना, तो उन्हें 'अंगद' नाम दिया। इसका अर्थ है- 'मेरे शरीर का अंग'। गुरु नानक जी ने कहा था कि अंगद उनकी ही ज्योत (प्रकाश) का हिस्सा हैं।
 
3. गुरमुखी लिपि के जनक: आज पंजाबी भाषा जिस 'गुरमुखी' लिपि में लिखी जाती है, उसका मानकीकरण और संपादन गुरु अंगद देव जी ने ही किया था। उन्होंने इसे सरल बनाया ताकि आम लोग भी गुरुवाणी पढ़ सकें।
 
4. मल्ल अखाड़ा की शुरुआत: गुरु साहिब केवल आध्यात्मिक शिक्षा के पक्षधर नहीं थे, बल्कि शारीरिक फिटनेस पर भी जोर देते थे। उन्होंने 'मल्ल अखाड़ा' की परंपरा शुरू की, जहां युवाओं को कुश्ती और शारीरिक व्यायाम के लिए प्रेरित किया जाता था।
 
5. लंगर परंपरा का विस्तार: गुरु नानक देव जी द्वारा शुरू की गई 'लंगर' की परंपरा को उन्होंने व्यापक रूप दिया। उनकी पत्नी, माता खीवी जी, लंगर की व्यवस्था संभालती थीं और उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि लंगर में खीर और पौष्टिक भोजन सभी को समान रूप से मिले।
 
6. पहली जीवनी (जनम साखी): गुरु अंगद देव जी ने ही गुरु नानक देव जी के जीवन प्रसंगों और उनकी शिक्षाओं को संकलित करवाया। इसे 'भाई बाले वाली जनम साखी' के नाम से जाना जाता है, जो सिख इतिहास का पहला लिखित दस्तावेज है।
 
7. हुमायूं का अहंकार तोड़ा: जब मुगल सम्राट हुमायूं शेरशाह सूरी से हारने के बाद गुरु साहिब से आशीर्वाद लेने आया, तो गुरु जी ध्यान में थे। हुमायूं को इंतजार करना पड़ा और उसने गुस्से में तलवार निकाल ली। गुरु जी ने शांत भाव से कहा, 'यह तलवार अपनों के सामने तो निकल रही है, लेकिन युद्ध के मैदान में कहां थी' हुमायूं को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने माफी मांगी।
 
8. सादगी भरा जीवन: गुरु होने के बावजूद वे अपना गुजारा स्वयं मूंज की रस्सी बटकर (बनाकर) करते थे। दरबार का चढ़ावा और दान वे केवल लंगर और समाज सेवा में ही खर्च करते थे।
 
9. 63 श्लोकों की रचना: श्री गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु अंगद देव जी के 63 श्लोक दर्ज हैं। इनमें अहंकार को त्यागने और परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश दिया गया है।
 
10. खादुर साहिब की स्थापना: उन्होंने खादुर साहिब (पंजाब) को सिख धर्म के प्रचार का मुख्य केंद्र बनाया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 13 वर्ष यहीं बिताए और अपनी मृत्यु से पहले गुरु अमरदास जी को तीसरा गुरु नियुक्त किया।
 
गुरु अंगद देव जी 29 मार्च 1552 को खदूर साहिब में ज्योति जोत समा गए, और गुरु अमरदास जी को तीसरा गुरु नियुक्त किया था। गुरु अंगद देव जी का जीवन हमें सिखाता है कि एक सच्चा शिष्य वही है जो गुरु की आज्ञा में अपना अस्तित्व विलीन कर दे। उनकी निस्वार्थ सेवा और अनुशासन आज भी पूरी मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है। 
 

'जिसु पिआरे सिउ नेहु तिसु आगै मरि चलिए।'

अर्थात्: जिस प्रिय परमात्मा से प्रेम है, उसके सामने अपने अहंकार को मार देना ही सच्चा प्रेम है।
 
इस प्रकार, गुरु अंगद देव जयंती न केवल गुरु अंगद देव जी की याद में मनाया जाता है, बल्कि यह धैर्य, अनुशासन, भक्ति और सेवा का प्रतीक भी है। इस दिन की शिक्षाएं आज भी जीवन में सकारात्मक मूल्य और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।
 
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