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प्राणायाम योग क्रिया को जानें

अनिरुद्ध जोशी
शनिवार, 9 जुलाई 2011 (18:26 IST)
'प्राणस्य आयाम: इत प्राणायाम'। ''श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायाम''-(यो.सू. 2/49)
भावार्थ : अर्थात प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को रोकना प्राणायाम है।
 
यहां क्रमश: कुछ नाम लिखे जा रहे हैं- जड़, प्राण, मन, बुद्धि, विवेक और आत्मा। शरीर और मन के बीच की कड़ी है प्राण। प्राण यदि असंतुलित है तो शरीर और मन-मस्तिष्क सभी असंतुलित रहेगा।

प्राणायाम की परिभाषा :

प्राण + आयाम अर्थात प्राण याने श्वास और आयाम याने दो श्वासों में दूरी। आयाम के तीन अर्थ है प्रथम दिशा और द्वितीय योगानुसार नियंत्रण या रोकना, तृतीय- विस्तार या लम्बायमान होना। प्राणों को ठीक-ठीक गति और आयाम दें, यही प्राणायाम है।
 
हम जब श्वास लेते हैं तो भीतर जा रही हवा या वायु पांच भागों में विभक्त हो जाती है या कहें कि वह शरीर के भीतर पांच जगह स्थिर हो जाता हैं। ये पंचक निम्न हैं- (1)व्यान, (2)समान, (3)अपान, (4)उदान और (5)प्राण।
 
उक्त से ही चेतना में जागरण आता है और स्मृतियां सुरक्षित रहती है। इसी से मन संचालित होता है तथा शरीर का रक्षण व क्षरण होता रहता है। उक्त में से एक भी जगह गड़बड़ है तो सभी जगह उससे प्रभावित होती है और इसी से शरीर, मन तथा चेतना भी रोग और शोक से ‍घिर जाते हैं।
 
चरबी-मांस, आंत, गुर्दे, मस्तिष्क, श्वास नलिका, स्नायुतंत्र और खून आदि सभी प्राणायाम से शुद्ध और पुष्ट रहते हैं।
 
(1)व्यान : व्यान का अर्थ जो चरबी तथा मांस का कार्य करती है।
(2)समान : समान नामक संतुलन बनाए रखने वाली वायु का कार्य हड्डी में होता है। हड्डियों से ही संतुलन बनता भी है।
(3)अपान : अपान का अर्थ नीचे जाने वाली वायु। यह शरीर के रस में होती है।
(4)उदान : उदान का अर्थ उपर ले जाने वाली वायु। यह हमारे स्नायुतंत्र में होती है।
(5)प्राण : प्राण वायु हमारे शरीर का हालचाल बताती है। यह वायु मूलत: खून में होती है।
 

प्राणायाम करते समय तीन क्रियाएँ करते हैं-

1.पूरक 2.कुम्भक 3.रेचक। इसे ही हठयोगी अभ्यांतर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और बाह्य वृत्ति कहते हैं।
 

पतंजल‍ि ने प्राणायाम की चार क्रियाएं बताई हैं-

प्रथम बाह्‍य वृत्तिक, द्वितीय आभ्यांतर वृत्तिक, तृतीय स्तम्भक वृत्तिक और चतुर्थ वह प्राणायाम होता है, जिसमें बाह्‍य एवं आभ्यांतर दोनों प्रकार के विषय का अतिक्रमण होता है।
 
(1)पूरक:- अर्थात नियंत्रित गति से श्वास अंदर लेने की क्रिया को पूरक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब भीतर खिंचते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
 
(2)कुम्भक:- अंदर की हुई श्वास को क्षमतानुसार रोककर रखने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं। श्वास को अंदर रोकने की क्रिया को आंतरिक कुंभक और श्वास को बाहर छोड़क पुन: नहीं लेकर कुछ देर रुकने की क्रिया को बाहरी कुंभक कहते हैं। इसमें भी लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
 
(3)रेचक:- अंदर ली हुई श्वास को नियंत्रित गति से छोड़ने की क्रिया को रेचक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब छोड़ते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
 

प्राणायाम के प्रकार :

नाड़ीशोधन, भ्रस्त्रिका, उज्जाई, भ्रामरी, कपालभाती, केवली, दीर्घ, शीतकारी, शीतली, मूर्छा, सूर्यभेदन, चंद्रभेदन, प्रणव, अग्निसार, उद्गीथ, नासाग्र, प्लावनी, शितायु (shitau) आदि।

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