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अजय और तब्बू का दे दे प्यार दे के सेट पर कैसा था व्यवहार, बता रहे हैं अकीव अली

रूना आशीष
फिल्म 'दे दे प्यार दे' की स्टोरी लाइन सबसे पहले मुझे लव रंजन ने सुनाई थी। उसने कहा कि एक 50 साल का शख्स है जिसे 15 साल की लड़की से इश्क हो जाता है, तो मैंने पूछा कि इसमें कौन सी नई बात है? लव ने कहा कि कहानी अब वहां आ पहुंचती है कि लड़का इस लड़की को मिलवाने के लिए अपने घर ले जाता है, जहां उसकी पत्नी हैं, बच्चे हैं, मां और बाप हैं। और एक बात ये कि मां-बाप उसकी पत्नी को पसंद करते हैं।'
 
फिल्म 'दे दे प्यार दे' के निर्देशक अकीव अली, लव रंजन के खास दोस्त और उनकी फिल्मों में एडिटर रहे हैं। फिल्म 'दे दे प्यार दे' के प्रमोशन के दौरान निर्देशक अकीव अली ने बातचीत की 'वेबदुनिया' संवाददाता रूना आशीष से।
 
आपकी फिल्म में दो कलाकार ऐसे हैं, तब्बू और अजय, जो राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं। कोई टेंशन नहीं हुआ?
हुआ, लेकिन वो पहले आधे घंटे में चला गया, क्योंकि मुझे इन दोनों से मिलकर समझ आ गया कि ये लोग यहां काम करने आए हैं, न कि ये जताने कि वे कितने बड़े कलाकार हैं। ये दोनों अपने काम और रोल को समझने में मशगूल थे। कुछ बार ऐसा भी हुआ कि मैं कहीं अटक गया तो अजय के पास जाकर पूछ लिया कि आप 50 साल के हो और आप बता दो कि कैसे हमारा हीरो रिऐक्ट करेगा? तो वे बताते थे। ये सेट पर पहुंचते थे और मुझसे पूछते थे कि क्या करना है, बता दो। हमने एक अच्छी फिल्म बनाने की ठानी थी और सभी लोग उसी दिशा में काम कर रहे थे।


 
ये आपकी पहली फिल्म है, लव रंजन (फिल्म के लेखक) की कोई दखलंदाजी नहीं है?
दखलंदाजी नहीं, लेकिन क्रिएटिव इनपुट रहे। मेरे और लव के रिश्ते ऐसे हैं कि हम 4-5 लोगों की कंपनी है, जो फिल्म बनाते हैं। उसकी फिल्म होती है तो एडिट मैं करता हूं। पहले तो फिर भी वो अपनी फिल्म के एडिट देखने आ जाता था अब तो कहता है तू एडिट कर, फाइनल कट देख लूंगा। हम लोग फिल्म को अच्छा बनाने पर जोर देते हैं तो एक-दूसरे को सुझाव भी देते हैं।
 
वो सेट पर भी नहीं आते थे?
सेट पर घूमने आते थे। स्टोरी नरेट की और चले जाते थे। एक बार 9 बजे की शिफ्ट थी और लव 12.30 बजे पहुंचे तो मैंने कहा तुम लेट हो? शिफ्ट तो 9 बजे की है, तो वो बोला, तू निर्देशक है, तू आना टाइम पर, मैं तो निर्माता हूं, अपनी मर्जी से आऊंगा सेट पर घूमने।
 
फिल्म में रकुल का सिलेक्शन कैसे हुआ?
हम फिल्म के लिए एक ऐसा चेहरा तलाश रहे थे, जो जरूरी नहीं था कि वो नया हो। कोई थोड़ा जाना-पहचाना भी चलता लेकिन कोई ऐसा चाहिए था जिसने कभी अजय के साथ काम न किया हो और उम्र तो 24-25 साल चाहिए थी। किसी ने रकुल का नाम सुझाया। मैंने भी सोचा और कहा कि चलो 'यारियां' भी की है तो उसमें भी 5 साल हो गए हैं। उसे ऑफिस में मिलने बुलाया और बातचीत की फिर वे भी अपने दूसरे प्रोजेक्ट्स में बिजी हो गईं। 2 महीने बाद मुझे लव ने पूछा कि हीरोइन रखनी है या नहीं? तो मैंने और मेरे असिस्टेंट ने एकसाथ रकुल का नाम कह दिया। लव ने कहा कि अब टाइम नहीं है, फोटो शूट कर लो। और फोटोशूट और ऑडिशन दोनों में वे फिट लगीं और हमारी फिल्म का हिस्सा बन गईं।
 
अब आगे निर्देशन या एडिटिंग?
मैं तो एडिटर भी बिना सोचे-समझे बन गया और निर्देशन का भी मौका मिल ही गया। लेकिन मुझे एडिटिंग से बहुत प्यार है। मैं एडिटिंग कभी नहीं छोड़ सकता। मैंने तो मेरी फिल्म में भी बिना किसी हिचक के सीन को काटकर छोटे किए हैं। अभी लव की अगली फिल्म है और मेरी कंपनी की ही और भी फिल्में आने वाली हैं। मैं वे सब एडिट करूंगा। सब फिल्मों को सुंदर बनाने की कोशिश करूंगा और हम मिलकर अच्छी फिल्म बनाएंगे।

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