Dharma Sangrah

प्रेम की पाती प्रीतम के नाम

मधु टाक
हर राज दिल का तुम्हें बताने को जी चाहता है
हर इक सांस में तुम्हें बसाने को जी चाहता है
यही है मेरे प्यार,नेह और विश्वास की बंदगी
खुद से ज्यादा तुम्हें प्यार करने को जी चाहता है 
 
चाँद तारों की सौगात तुम्हें देने को जी चाहता है
खुदा के बदले तेरी बंदगी करने को जी चाहता है
न लगे कभी नजर तुम्हें इस बेरहम जमाने की
सर पर से तेेरे खुद को वारने को जी चाहता है
 
राहों में सदा  चिराग  जलाने को जी चाहता है 
दामन में उनके सितारे सजाने को जी चाहता है 
हर इक ख़्वाब जो देखा मुकम्मल हो जाए
तेरी चाहत को तकदीर बनाने को जी चाहता है 
 
हर इक खुशी साथ तेरे बिताने को जी चाहता है 
हर मुश्किलों से तुम्हें बचाने के जी चाहता है 
धड़कते हुए दिल की यही आरजू है हर पल
दो रंगी दुनिया से तुम्हें बचाने के जी चाहता है
 
बहते झरनों का संगीत सुनाने को जी चाहता है 
चाँद की चांदनी में तुम्हें सुलाने को जी चाहता है 
कुदरत ने जो बक्शे हैं तोहफे बेशकीमती"मधु"
दामन में तेरे कोहनूर जड़ने को जी चाहता है...
 

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