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लगातार तप कर कुंदन बनीं सिंधू

ऋतुपर्ण दवे
एक जीत और तीन खुशी! कितना गर्व होगा उस परिवार को जिसकी संतान ने दुनिया के बैडमिंटन इतिहास में महिला विश्व चैंपियनों की सूची में भारत का नाम आखिरकार दर्ज कराकर ही दम लिया। पहली खुशी का नाम अब 'पुसरला वेंकट सिंधू' यानी 'पीवी सिंधू' हो गया है। दूसरा खुशी भारत की आधी आबादी के प्रति सम्मान और भरोसे का बैडमिंटन में पहला विश्व खिताब सोने का तमगा है।
 
 
वहीं संयोग ही कहा जाएगा, जो ईश्वर को भी मंजूर था कि तीसरी खुशी मां के जन्मदिन की खुशी के साथ सिंधू के शब्दों में 'हैप्पी बर्थ डे मॉम' है। 24 बरस की देश की इस लाड़ली ने अपना विश्व खिताब अपनी मां को उनके जन्मदिन के मौके पर दिया। ऐसा लगता है कि अपने आप में रोमांचित करने वाली यह जीत पीवी सिंधू के लिए इन्हीं संयोगों का इंतजार कर रही थी।
 
बिना शोरगुल के एक हल्की-सी आहट के बीच 5 फुट 10 इंच की इस लड़की ने अपनी मेहनत से बैडमिंटन की दुनिया में अपने कद को आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंचा ही दिया। इस जीत के साथ उन्होंने उसी जापानी खिलाड़ी नोजमी ओकुहारा के हाथों 2 साल पहले फाइनल में मिली हार का भी हिसाब-किताब चुकता कर दिया।
 
 
सिंधु का इस टूर्नामेंट में यह लगातार तीसरा फाइनल था जिसमें विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के महिला सिंगल फाइनल में भारत की इस स्टार खिलाड़ी ने जापान की स्टार नोजोमी ओकुहारा को 37 मिनट तक चले एकतरफा फाइनल मैच में सीधे-सीधे 2 सेटों में 21-7, 21-7 से हराया। इस तरह अंतत: मां के जन्मदिन के दिन ही इस स्वर्ण खिताब को जीत घर, परिवार सहित देश की झोली में खुशियां ही खुशियां भर इस प्रतिष्ठित टूर्नमेंट में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय शटलर बन गईं।

 
भारत की पहली विश्व महिला बैडमिंटन चैंपियन सिंधु के पास इस टूर्नामेंट के तीनों मेडल यानी गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज हैं। गौरतलब है कि सिंधू पहले 2 ब्रॉन्ज मेडल भी जीत चुकी हैं। इससे पहले स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित इसी चैंपियनशिप में 2017 में नोजमी ओकुहारा जीती थीं और सिंधू को सिल्वर मेडल मिला था जबकि 2018 में चीन के नानजिंग में खेले गए वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप के फाइनल में स्पेन की कैरोलिना मारिन से हारकर भी सिंधु को सिल्वर मेडल से ही संतोष करना पड़ा।

 
बैडमिंटन विश्व चैंपियन बनते ही इस लड़की के तमाम कमाल हर किसी की जुबान पर छा गए। यकीनन समूचे भारत और दुनियाभर में रह रहे भारतीयों के लिए यह बेहद फख्र की बात है। 7 जुलाई 2012 को एशिया यूथ अंडर-19 चैंपियनशिप के फाइनल में सिंधू ने नोजोमी ओकुहरा को 18-21, 21-17, 22-20 से हराया था। उनका बैडमिंटन का सफर बड़ा संघर्षपूर्ण रहा।
 
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिंधु ने कोलंबो में आयोजित 2009 सब जूनियर एशियाई बैडमिंटन चैंपियनशिप में कांस्य, 2010 में 'ईरान फज्र इंटरनेशनल बैडमिंटन चैलेंज' के एकल वर्ग में रजत हासिल किया तथा 2010 में ही मैक्सिको में आयोजित जूनियर विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल में वे पहुंचीं।
 
 
14 जून 2012 को इंडोनेशिया ओपन में जर्मनी के जूलियन शेंक से हार गईं। 2012 में चीन ओपन बैडमिंटन सुपर सीरीज टूर्नामेंट में लंदन ओलंपिक 2012 के स्वर्ण पदक विजेता चीन के ली जुएराऊ को हराकर सेमीफाइनल में पहुंची। चीन के ग्वांग्झू में 2013 के विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में एकल में कांस्य पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बैडमिंटन खिलाड़ी हैं।
 
 
बैडमिंटन में भारत इस उभरती हुई खिलाड़ी ने अपने प्रदर्शन को और भी बेहतर बनाते हुए कई खिताब जीते। 1 दिसंबर 2013 को कनाडा की मिशेल ली को हराकर मकाऊ ओपन ग्रां प्री गोल्ड का महिला सिंगल्स खिताब हासिल किया, जहां शीर्ष वरीयता प्राप्त 18 वर्षीय सिंधु ने सिर्फ 37 मिनट के खिताबी मुकाबले में मिशेल को सीधे गेम में 21-15, 21-15 से हराकर अपना दूसरा ग्रां प्री गोल्ड खिताब जीता। इससे पहले मई में मलेशिया ओपन जीता था। सिंधु ने शुरुआत से ही दबदबा बनाए रखा था जिससे कनाडा की 7वीं वरीयता प्राप्त खिलाड़ी को कोई मौका नहीं मिला। सिंधु ने 2013 में भारत की 78वीं सीनियर नेशनल बैडमिंटन चैंपियनशिप का महिला सिंगल खिताब जीता।

 
पीवी सिंधु ब्राजील के रियो डि जेनेरियो में आयोजित किए गए 2016 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में भारत की तरफ से खेलते हुए महिला सिंगल मुकाबले में फाइनल तक पहुंचने वाली भारत की पहली भारतीय महिला खिलाड़ी भी बनीं। यहां सेमीफाइनल मुकाबले में सिंधु ने जापान की इसी नोजोमी ओकुहारा को सीधे सेटों में 21-19 और 21-10 से हराया था। फाइनल में उनका मुकाबला विश्व की प्रथम वरीयता प्राप्त खिलाड़ी स्पेन की कैरोलिना मारिन से हुआ, जो 3 राउंड चला। लेकिन यहां उन्हें सिल्वर मेडल से ही संतोष करना पड़ा।

 
पेशेवर पूर्व वॉलीबॉल खिलाड़ी दंपति पीवी रमण और श्रीमती पी. विजया के घर 5 जुलाई 1995 को जन्मीं पीवी सिंधू के पिता को वॉलीबॉल में उत्कृष्ट योगदान के लिए साल 2000 में भारत सरकार का प्रतिष्ठित 'अर्जुन' पुरस्कार भी मिल चुका है। लेकिन पीवी सिंधू का रुझान बैडमिंटन में महज 6 साल की उम्र में उस वक्त से हो गया, जब पुलेला गोपीचंद 'ऑल इंगलैंड ओपेन बैडमिंटन' के चैंपियन बने।
 
8 साल की होते-होते सिंधू बैडमिंटन में ऐसी रमीं कि फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इंडियन रेलवे सिग्नल इंजीनियरिंग और दूरसंचार के बैडमिंटन कोर्ट में अपने पहले गुरु महबूब अली से बैडमिंटन की शुरुआती बारीकियों को समझा और बाद में पहले से ही प्रभावित पुलेला गोपीचंद के 'गोपीचंद बैडमिंटन एकेडमी' चली गईं, जो उनके घर से 56 किलोमीटर दूर थी।

 
लेकिन उनके साहस, लगन, दृढ़ इच्छाशक्ति और जीतने की चाहत के संकल्प की दाद देनी ही होगी कि उन्होंने इस छोटी सी उम्र में ही न केवल घर छोड़ा बल्कि कठिन अभ्यास के साथ भरपूर परिश्रम किया जिसका नतीजा है कि आज वे विश्व चैंपियन हैं। पीवी सिंधू पर हर भारतीय को गर्व है! हो भी क्यों न, क्योंकि वे वह स्वयं स्थापित आईकॉन हैं जिनकी डिक्शनरी में 'नामुमकिन' शब्द है ही नहीं।
 
निश्चित रूप से 65 फीसदी युवाओं के लिए एक नई प्रेरणास्रोत सिंधू भारत की एक नई रोल मॉडल हैं, जो लगातार तपने के बाद कुंदन के रूप में देश के सम्मान की नई चमक, नई पहचान हैं।
 
 
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण 'वेबदुनिया' के नहीं हैं और 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

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