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आज का शेर
अफ़सोस तो ये है कि मेरे मद्दे मुक़ाबिल
ये तज्रबे सफर के किसी और को सुना
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता , मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो - निदा फाज़ली
तर दामनी पे शेख हमारी न जइयो
तर दामनी पे शेख हमारी न जइयो , दामन निचोड़ दें तो फरिश्ते वज़ू करें - दर्द
कमसिनी का हुस्न था वो, ये जवानी की बहार
कमसिनी का हुस्न था वो, ये जवानी की बहार पहले भी रुख पर यही तिल था मगर क़ातिल न था
फ़रिश्ते वक़्त से पहले अज़ाब देने लगे
फ़रिश्ते वक़्त से पहले अज़ाब देने लगे गली के बच्चे पलट कर जवाब देने लगे।
रोशनी बाँट ली उभरे हुए मीनारों ने
रोशनी बाँट ली उभरे हुए मीनारों ने पस्त ज़र्रों के मुक़द्दर में वही रात रही।
गंजीनाए माअनी का तिलिस्म उसको समझये
गंजीनाए माअनी का तिलिस्म उसको समझये जो लफ़्ज़ के ग़ालिब मेरे अशआर में आए।
वाजिब है मालदार को देना ज़कात का
वाजिब है मालदार को देना ज़कात का तुम मालदारे हुस्न हो बोसा दिया करो।
तुझे न माने कोई इससे तुझको क्या मजरूह
तुझे न माने कोई इससे तुझको क्या मजरूह चल अपनी राह भटकने दे नुकता चीनों को।
या रब न वो समझे हैं न समझेंगे मेरी बात
ग़ालिब न वो समझे हैं न समझेंगे मेरी बात दे और दिन उनको जो न दे मुझको ज़बां और।
रोक सकता हमें ज़िन्दान-ए-बाला क्या मजरूह
रोक सकता हमें ज़िन्दान-ए-बाला क्या मजरूह हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं।
फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर
फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर मर्दे नादां पर कलामे नर्मो नाज़ुक बेअसर।
तुम हो क्या, ये तुम्हें मालूम नहीं है शायद
तुम हो क्या, ये तुम्हें मालूम नहीं है शायद तुम बदलते हो तो मौसम भी बदल जाते हैं।
देश की ख़ातिर मिटादे अपनी हस्ती तू नदीम
देश की ख़ातिर मिटादे अपनी हस्ती तू नदीम आज के दिन होगी क़ुरबानी यही सब से अज़ीम।
उस आफ़ताबे शहर को उर्दू ज़ुबान में
उस आफ़ताबे शहर को उर्दू ज़ुबान में आदाब कह दिया तो मेरे घर में आ गया।
मुझी को नाज़ से देखा जला जो परवाना
मुझी को नाज़ से देखा जला जो परवाना तुम एक बज़्म में मर्दुमशनास बैठे हो।
दी मुअ़ज्ज़न ने अज़ां वस्ल की शब पिछले पहर
दी मुअ़ज्ज़न ने अज़ां वस्ल की शब पिछले पहर हाय कमबख्त को किस वक्त खुदा याद आया।
मुत्तसिल रोने से शायद कि बुझे आतिशे दिल
मुत्तसिल रोने से शायद कि बुझे आतिशे दिल एक- दो आँसू तो और आग लगा देते हैं।
ख़्याल-ए-वस्ल को अब आरज़ू झूला झुलाती है
ख़्याल-ए-वस्ल को अब आरज़ू झूला झुलाती है क़रीब आना दिल-ए-मायूस के फिर दूर हो जाना।
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