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मैं तेरा कुछ भी नहीं हूँ
मैं तेरा कुछ भी नहीं हूँ, मगर इतना तो बता देखकर मुझको तेरे जेह्न में आता क्या है - शहज़ाद अहमद
ज़िंदगी मैं भी मुसाफ़िर हूँ...
तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है , तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा - बशीर बद्र
ज़िंदगी मैं भी मुसाफ़िर हूँ
ज़िंदगी मैं भी मुसाफ़िर हूँ तेरी कश्ती का, तू जहाँ मुझसे कहेगी, मैं उतर जाऊँगा - मुईन नज़र
मैंने तो यूँही राख में फेरी थीं उंगलियाँ
मैंने तो यूँही राख में फेरी थीं उंगलियाँ, देखा जो ग़ौर से तेरी तस्वीर बन गई।
बढ़ाओ हाथ फूलों की तरफ़
बढ़ाओ हाथ फूलों की तरफ़ पर सोच लो इतना, गुलाबों की हिफ़ाज़त के लिए काँटे भी होते हैं।
कुछ पता तो चले
आप बंदा नवाज क्या जानें
जो गुज़रते हैं दाग पर सदमें आप बंदा नवाज क्या जानें- दाग़ देहलवी
लगता नहीं है जी मेरा
कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके
कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके वो ख़त भी मगर मैंने जला कर नहीं फेंके - अखतर नज़मी
मैं जो शायर कभी होता
मैं जो शायर कभी होता तेरा सेहरा कहता , चाँद को चाँद न कहता तेरा चेहरा कहता।
मुझे जान से भी प्यारा मेहबूब...
मुझे जान से भी प्यारा मेहबूब मिल गया है, जीने का ये सहारा क्या ख़ूब मिल गया है।
बच्चे उदास बैठे हैं पिंजरे के आस-पास
बच्चे उदास बैठे हैं पिंजरे के आस-पास जैसे समझ रहे हों परिन्दों की गुफ़्तगू -------अख़्तर नज़मी
क्या दोस्तो बताऊँ तुम्हें
क्या दोस्तो बताऊँ तुम्हें अपने दिल का हाल, गुज़रे तो होगे तुम किसी वीरान शहर से - फ़ाज़िल अंसारी
मुझको हैरत है के 'फ़ाज़िल'
मुझको हैरत है के 'फ़ाज़िल' फूल के होते हुए, लोग पत्थर ही से क्यों देते हैं पत्थर का जवाब ----फ़ाज़िल अंस
हर एक बात पे कहते
बहुत उदास है इक शख्स तेरे जाने से
बहुत उदास है इक शख्स तेरे जाने से जो हो सके तो चला आ उसी की ख़ातिर तू - अहमद फ़राज़
ग़ालिब का ख़त-39
ग़ालिब का ख़त-38
वो आए हैं पशेमाँ लाश पर आप
वो आए हैं पशेमाँ लाश पर आप, तुझे ऎ ज़िन्दगी लाऊँ कहाँ से- मोमिन
दिल से पहुँची तो हैं आँखों में लहू की बूँदें
दिल से पहुँची तो हैं आँखों में लहू की बूँदें, सिलसिला शीशे से मिलता तो है पैमाने का-------हसरत मोहान
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